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8 दिसंबर 2014

विश्व की प्राचीन सभ्यताएं और हिन्दू धर्म


भारतीय संस्कृति व सभ्यता विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है । मध्यप्रदेश के भीमबेटका में पाए गए 25 हजार वर्ष पुराने शैलचित्र, नर्मदा घाटी में की गई खुदाई तथा मेहरगढ के अलावा कुछ अन्य नृवंशीय एवं पुरातत्वीय प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि भारत की भूमि आदिमानव की प्राचीनतम कर्मभूमि रही है । यहीं से मानव ने अन्य जगहों पर बसाहट करने व वैदिक धर्म की नींव रखी थी । आज से 3500 वर्ष पूर्व जो सभ्यताएं जीवित थीं उनको पाश्चात्य इतिहासकारों ने “प्राचीन सभ्यताएं” मानकर ही मानव इतिहास और समाज का विश्लेषण किया, लेकिन उनका यह विश्लेषण एकदम गलत और ईसाई धर्म को स्थापित करने वाला था, इसके लिए उन्होंने ऐसे कई तथ्य नकारे, जो प्राचीन भारत और चीन के इतिहास को महान बताते हैं और ईसा बाद के समाज से कहीं ज्यादा उन्हें सभ्य सिद्ध करते हैं ।
प्राचीन सभ्यताओं पर अब कुछ ज्यादा ही शोध होने लगे हैं और उनसे नई-नई बातें निकलकर आ रही हैं, मसलन कि उनका एलियन से संबंध था और वे भी बिजली उत्पादन की तकनीक जानते थे । धरती पर फैली प्राचीन सभ्यताओं के बात करें तो धरती के पश्चिमी छोर पर रोम, ग्रीस और मिस्त्र देश की सभ्यताओं के नाम लिए जाते हैं तो पूर्वी छोर पर चीन का नाम लिया जाता है । मध्य में स्थित भारत की चर्चा भर करके उसे छोड़ दिया जाता है । क्यों? क्योंकि भारत को जानने से उनके समाज और धर्म के सारे मापदंड गिरने लगते हैं, तो वे नहीं चाहते हैं कि भारत और उसके धर्म का सच लोगों के सामने आए, लेकिन सच कब तक छिपा रहेगा ? दुनियाभर की प्राचीन सभ्यताओं से हिन्दू धर्म का क्या कनेक्शन था ? या कि संपूर्ण धरती पर हिन्दू वैदिक धर्म ने ही लोगों को सभ्य बनाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक विचारधारा की नए नए रूप में स्थापना की थी? आज दुनियाभर की धार्मिक संस्कृति और समाज में हिन्दू धर्म की झलक देखी जा सकती है चाहे वह यहूदी धर्म हो, पारसी धर्म हो या ईसाई-इस्लाम धर्म हो ।
ईसा से 2300-2150 वर्ष पूर्व सुमेरिया, 2000-400 वर्ष पूर्व बेबिलोनिया, 2000-250 ईसा पूर्व ईरान, 2000-150 ईसा पूर्व मिस्त्र (इजिप्ट), 1450-500 ईसा पूर्व असीरिया, 1450-150 ईसा पूर्व ग्रीस (यूनान), 800-500 ईसा पूर्व रोम की सभ्यताएं विद्यमान थीं । उक्त सभी से पूर्व महाभारत का युद्ध लड़ा गया था । इसका मतलब कि 3500 ईसा पूर्व भारत में एक पूर्ण विकसित सभ्यता थी ।
सिन्धू-सरस्वती घाटी की सभ्यता (5000-3500 ईसा पूर्व)- हिमालय से निकलकर सिन्धु नही अरब के समुद्र में गिर जाती है । प्राचीनकाल में इस नदी के आसपास फैली सभ्यता को ही सिन्धु घाटी की सभ्यता कहते हैं । इस नदी के किनारे के दो स्थानों हड़प्पा और मोहनजोदड़ो (पाकिस्तान) में की गई खुदाई में सबसे प्राचीन और पूरी तरह विकसित नगर और सभ्यता के अवशेष मिले ।
हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में असंख्य देवियों की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं । ये मूर्तियां मातृदेवी या प्रकृति देवी की हैं । प्राचीनकाल से ही मातृ या प्रकृति की पूजा भारतीय करते रहे हैं और आधुनिक काल में भी कर रहे हैं । इतना तो तय है कि इस काल में महाभारत का युद्ध इसी क्षेत्र में हुआ था । लोगों के बीच हिंसा, संक्रामक रोगों और जलवायु परिवर्तन ने करीब 4 हजार साल पहले सिन्धु घाटी या हड़प्पा सभ्यता का खात्मा करने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी । यह दावा एक नए अध्ययन में किया गया है ।
नॉर्थ कैरोलिना स्थित एप्पलचियान स्टेट यूनिवर्सिटी में नृविज्ञानी (एन्थ्रोपोलॉजी) की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ ग्वेन रॉबिन्स शुग ने एक बयान मे कहा कि जलवायु, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों, सभी ने शहरीकरण और सभ्यता के खात्में की प्रक्रिया में भूमिका निभाई, लेकिन इस बारे में बहुत कम ही जानकारी है कि इन बदलावों ने मानव आबादी को किस तरह प्रभावित किया ।
आज जिस हिस्से को पाकिस्तान और अफगानिस्तान कहा जाता है, महाभारतकाल में इसे पांचाल, गांधार, मद्र, कुरु और कंबोज की स्थली कहा जाता था । अयोध्या और मथुरा से लेकर कंबोज (अफगानिस्तान का उत्तर इलाका) तक आर्यावर्त के बीच वाले खंड में कुरूक्षेत्र था, जहां यह युद्ध हुआ । आजकल यह हरियाणा का एक छोटा-सा क्षेत्र है ।
उस काल में सिन्धु और सरस्वती नदी के पास ही लोग रहते थे । सिन्धु और सरस्वती के बीच के क्षेत्र में कई विकसित नगर बसे हुए थे । यहीं पर सिन्धु घाटी की सभ्यता और मोहनजोदड़ो के शहर भी बसे थे । मोहनजोदड़ो सिन्धु नदी के दो टापुओं पर स्थित है ।
जब पुरातत्व शास्त्रियों ने पिछली शताब्दी में मोहनजोदड़ो स्थल की खुदाई के अवशेषों का निरीक्षण किया था तो उन्होंने देखा कि वहां की गलियों में नरकंकाल पड़े थे । कई अस्थिपंजर चित अवस्था में लेटे थे और कई अस्थिपंजरों ने एक-दूसरे के हाथ इस तरह पकड़े रखे थे मानो किसी विपत्ति ने उन्हें अचानक उस अवस्था में पहुँचा दिया था ।
उन नरकंकालों पर उसी प्रकार की रेडियोंएक्टिविटी के चिह्न थे, जैसे कि जापानी नगर हिरोशिमा और नागासाकी के कंकालों पर एटम बम विस्फोट के पश्चात देखे गए थे । मोहनजोदड़ो स्थल के अवशेषों पर नाइट्रिफिकेशन के जो चिह्न पाए गए थे, उसका कोई स्पष्ट कारण नहीं थी, क्योंकि ऐसी अवस्था केवल अणु बम के विस्फोट के पश्चात ही हो सकती है । उल्लेखनीय है कि महाभारत में अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था जिसके चलते आकाश में कई सूर्यों की चमक पैदा हुई थी ।
                                                                      संभारः उदित वाणी, 30 नवम्बर, 2014





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