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नव वर्ष के शुभ अवसर पर शब्द क्रान्ति की तरफ से हार्दिक बधाई एवं नव वर्ष की शुभकामनाये । ...

11 फ़रवरी 2016

वसंत पंचमी व सरस्वती पूजा

बसंत पंचमी प्रसिद्ध भारतीय त्योहार है । इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है । यह पूजा सम्पूर्ण भारत में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है । बसंत पंचमी के पर्व से ही बसंत ऋतु का आगमन होता है । शांत, ठंडी, मंद वायु, कटु शीत का स्थान ले लेती है तथा सब को नवप्राण व उत्साह से स्पर्श करती है ।  बसंत पंचमी को सभी शुभ कार्यों के लिए अत्यंत शुभ मुहूर्त माना जाता है । मुख्यतः विद्यारंभ, नवीन विद्या प्राप्ति एवं गृह प्रवेश के लिए  शुभ माना जाता है  । बसंत पंचमी को अत्यंत शुभ मानने के पीछे अनेक कारण है । यह पर्व अधिकतर माघ मास में ही पड़ता है । माघ मास का भी धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व बताया गया । इस माह में सूर्यदेव भी उतरायण होते है । पुराणों में उल्लेख मिलता है कि देवताओं का एक अहोरात्र (दिन-रात) मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है, अर्थात उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन रात्रि कही जाती है । सूर्य की क्रांति 22 दिसम्बर को अधिकतम हो जाती है और यही से सूर्य उत्तरायण शनि हो जाते हैं । 14 जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते है और अगले 6 माह तक उत्तरायण रहते हैं । सूर्य का मकर से मिथुन राशियों के बीच भ्रमण उत्तरायण कहलाता है । चूंकि बसंत पंचमी का पर्व इतने शुभ समय में पड़ता है, अतः इस पर्व का स्वतः ही आध्यात्मिक, धार्मिक, वैदिक आदि सभी दृष्टियों से अति विशिष्ट महत्व परिलक्षित होता है ।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण                                                     
सरसों का फूल ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य को ब्रह्माण्ड की आत्मा, पद, प्रतिष्ठा, भौतिक समृद्धि, औषधि तथा ज्ञान और बुद्धि का कारक ग्रह माना गया है । इसी प्रकार पंचमी तिथि किसी न किसी देवता को समर्पित है । बसंत पंचमी को मुख्यतः सरस्वती पूजन के निमित्त ही माना गया है । इस ऋतु में प्रकृति को ईश्वर प्रदत्त वरदान खेतों में हरियाली एवं पौधों एवं वृक्षों पर पल्लवित पुष्पों एवं फलों के रूप में स्पष्ट देखा जा सकता है । सरस्वती का जैसा शुभ श्वेत, धवल रूप वेदों में वर्णित किया गया है, वह इस प्रकार है-
या कुन्देन्दु-तुषार-हार-धवला या शुभ्रवस्त्रावृता, या वीणा-वर दण्डमण्डित करा या श्वेत पद्मासना ।
या ब्रह्मा-च्युत शंकर-प्रभृतिभिर्दैवेः सदा वन्दिता, सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाडयापहा ।।
अर्थात देवा सरस्वती शीतल चंद्रमा की किरणों से गिरती हुई ओस की बूंदों के श्वेत हार से सुसज्जित, शुभ वस्त्रों से आवृत्त, हाथों में वीणा धारण किये हुए वर मुद्रा में अति श्वेत कमल रूपी आसन पर विराजमान है । शारदा देवी ब्रह्मा, शंकर, अच्युत आदि देवताओं द्वारा भी सदा ही वन्दनीय है । ऐसी देवी सरस्वती हमारी बुद्धि की जड़ता को नष्ट करके हमें तीक्ष्ण बुद्धि एवं कुशाग्र मेधा से युक्त करें ।
ज्ञान का महापर्व सरस्वती पूजन

सरस्वती देवी ग्रंथों के अनुसार वाग्देवी सरस्वती ब्रह्मस्वरूपा, कामधेनु तथा समस्त देवों की प्रतिनिधि हैं । ये ही विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी है । अनंत गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा-आराधना के लिए माघ मास की पंचमी तिथि निर्धारित की गयी है । बसंत पंचमी को इनका आविर्भाव दिवस माना जाता है । अतः वागीश्वरी जयंती व श्री पंचमी नाम से भा यह तिथि प्रसिद्ध है । ऋग्वेद के 10/125 सूक्त में सरस्वती देवी के असीम प्रभाव व महिमा का वर्णन है । माँ सरस्वती विद्या व ज्ञान की अधिष्ठात्री है । कहते हैं जिनकी जिह्वा पर सरस्वती देवी का वास होता है, वे अत्यंत ही विद्वान व कुशाग्र बुद्धि होते हैं । बहुत लोग अपना ईष्ट माँ सरस्वती को मानकर उनकी पूजा-आराधना करते हैं । जिन पर सरस्वती की कृपा होती, वे ज्ञानी और विद्या के धनी होते हैं । 
ऐतिहासिक स्थान
प्राचीन शारदापीठ का मंदिर पाक अधिकृत कश्मीर में नीलम जिले में है, जो अब खंडहर के रूप में परिवर्तित हो चुका है । भारत में माँ शारदा का मंदिर एवं सिद्धपीठ मध्य प्रदेश के सतना जिले में त्रिकूट पर्वत पर अपनी संपूर्ण भव्यता के साथ स्थित है, जहाँ लाखों दर्शनार्थी बसंत पंचमी पर लगभग एक हजार सीढिंया चढ़कर दर्शनार्थ जातें हैं ।

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