निकल गई किसी और के संग, रह गए अरमां धरे-धरे ।
वो तो कटी पतंग थी, मैं तो ठहरा मांझा ।
आंसुओं का क्या रोकना, गम भी न कर सकता साझा ।
झर-झर आंसू बहा रहा हूँ, बिस्तर पर पड़े-पड़े ।
बन गई थी वो दोस्त मेरे बाजार-ए-शाम खड़े-खड़े ।
यो क्यों पूछते हो तुम, पल-पल में हाल मेरा ।
जिसका न कोई हमसफर है, कैसे कटेगी शाम-सबेरा ।
सफर के हमसफर लाने, फिर से फेक रहा हूँ डोरा ।
अपनी किस्मत रूठी रहे या हाथ में आये कटोरा ।
लेकर कटोरा पार्क में बेचूँगा चना-चबेने ।
बन गई थी वो दोस्त मेरे बाजार-ए-शाम खड़े-खड़े ।
जेपी हंस
बहुत सुन्दर रचना
ReplyDeleteआपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!
हार्दिक आभार...
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