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10 July, 2019
04 July, 2019
प्रतियोगिता परीक्षा द्वारा सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति हो।
माननीय मुख्यमंत्री, बिहार
पटना
विषयः-
सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा द्वारा कराने
के संबंध में ।
महोदय,
आप
भारतीय राजनीति के बहुमूल्य मोती रहे हैं, इसलिए बिहार के छात्रों का एक बड़ा समूह
आपसे एक महत्वपूर्ण विषय पर हस्तक्षेप की मांग करते हैं । हम ऐसे छात्र हैं जिनकी
पृष्ठभूमि कई कारणों से 'गोल्डेन' नहीं
है लेकिन हममें अच्छा परिणाम देने का जज्बा है । आप स्वच्छ छवि के प्रशासक हैं ।
मितभाषी स्वभाव आपके नाम के अनुरुप है और परिणाम-उन्मुख कार्यशैली आपकी पहचान है ।
योग्यता के बावजूद पीछे रह जाने की पीड़ा कैसी होती है, आप
हमसे बेहतर जानते हैं । अत: हम आपसे उम्मीद कर रहे हैं कि असिस्टेंट प्रोफेसर की
बहाली में ''डिग्री लाओ, नौकरी पाओ''
की पुरानी परिपाटी को तोड़ डालने की ऐतिहासिक कोशिश के सूत्रधार
बनेंगे । हमारे प्रार्थना पत्र को पढने की कृपा कीजिए और हो सके तो सरकार में
हमारी आवाज बनिए ।
1.
आज के दौर में किसी भी क्षेत्र
में बेहतर प्रतिभा को प्रतियोगिता परीक्षा के द्वारा चुना जाता है । ग्रुप डी के
पदों की बहाली में भी अकादमिक रिकार्ड की गुणवत्ता संदिग्ध मानी जाती है ।
असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया इससे बाहर क्यों रहे !!
2.
यदि सामाजिक न्याय और समावेशी
विकास को वास्तव में नीति में स्थान दिया गया है तो फिर वैसे लोगों की असिस्टेंट
प्रोफेसर की बहाली में स्थान सुनिश्चित करना होगा जो समाज के हाशिए से आते हैं ,
जिनके
पुरखे साधनविहीन हैं, सतर्क नहीं रहे हैं ।
सवर्णों में भी देहातों से आने वाले छात्रों की पृष्ठभूमि ऐसा ही है ।
3.
अकादमिक रिकार्ड के आधार पर
बहाली में उस असमानता का निराकरण कैसे होगा जो अलग- अलग बोर्डों एवं विश्वविधालयों
के मार्किंग पैटर्न की भिन्नता से जन्मी है । बीएचयू में पीजी में जितना अंक मिलता
है उतना मगध विवि, पटना विवि इत्यादि में
नहीं मिलता । साथ ही एक ही विवि के अलग- अलग कालखंड में दिए गए अंकों में भिन्नता
है ।
4.
संविधान सभी भारतीयों को
बराबरी का दर्जा देता है । इसे ब्रह्म वाक्य समझकर बिहारी छात्र दूसरे राज्यों में
इंटरव्यू देने जाता है, खाली
हाथ वापस आता है और बिहार ज्यूडसरी सहित तमाम दूसरे अच्छे पदों पर हम बाहरी को दिल
खोल कर स्वागत करते हैं । आखिर ऐसी उदारता दूसरे प्रांत वाले नहीं दिखाते तो हमारी
सरकार अपने बच्चों का संरक्षण करने का उपाय वैधाधिक, व्यवहारिक
तरीकों से क्यों नहीं करती ? यदि
इंटरव्यू लेने का प्रावधान रखा जाता है तब इंटरव्यू बोर्ड के लिए चुने जाने वाले
सदस्य यूपी, झारखंड,
दिल्ली,
एमपी,
राजस्थान
से न लिये जाएं ।
5.
अकादमिक रिकार्ड में यूजीसी
रेगुलेशन 2018 के तहत जो भारांक पीएचडी डिग्रीधारियों और नेट पास अभ्यर्थी को दिया
जा रहा है वह बहुत बङी विसंगति है । जब पीएचडी को वरीयता ही देना है तब फिर हरेक
साल दो--दो बार नेट की परीक्षा आयोजित करने का क्या औचित्य है !
6.
पीएचडी की डिग्री की साख पर कई रिपोर्ट सवालिया
निशान लगा चुके हैं । खुद यूजीसी अब 2009 के रेगुलेशन के तहत पीएचडी किए जाने को
अब मान्यता दे रहा है । सवाल है कि जिन्होनें 2009 के रेगुलेशन के पहले ईमानदारी
से पीएचडी किया है, उनके हित कैसे सुरक्षित
रखे जायेंगे ? साथ ही 2009 के रेगुलेशन से
जिन्होनें पीएचडी किया है उन्होनें अपने थिसिस लेखन में कट- पेस्ट- कापी का सहारा
नहीं लिया है , इसकी गारंटी भी नहीं है
।यूजीसी ने हाल ही में इस सम्बंध में सवाल उठाये हैं । यही कारण है कि यूपी सहित
कई राज्य इसकी बहाली प्रतियोगिता परीक्षा के जरिए करते हैं ।
7.
कई सारे तकनीकी पेंचों को
देखते हुए यह ज्यादा जरुरी हो जाता है कि
सभी सम्बद्ध पक्षों का हित यथासंभव सुरक्षित रहे
। इसलिए एक ऐसे माडल पर विचार किया जाए जिसमें कुछ इस तरह प्रावधान हो :-
(क)
70 अंक प्रतियोगिता परीक्षा + 20 अकादमिक भारांक + 10 अंक साक्षात्कार ।
(ख)
70 अंक प्रतियोगिता परीक्षा + 30 अकादमिक भारांक । परीक्षा में आये अंकों और
अकादमिक भारांक के आधार पर मेरिट लिस्ट बनायी जाए । साक्षात्कार नहीं होने से
बहाली की प्रक्रिया बेहद कम समय में पूरी हो सकती है ।
8. प्रतियोगिता परीक्षा में नेट / सेट / बेट /
पुराने - नये सभी पीएचडी को बैठने का मौका मिले ।
9.
प्रतियोगिता परीक्षा की प्रक्रिया बदनामी से मुक्त बेदाग हो, इसके लिए जरुरी है कि परीक्षा हर विषय की वस्तुनिष्ठ 【Objectives】ली
जाए । सब्जेक्टिव में परीक्षक की मर्जी चलने लगती है । परीक्षार्थी की बायोमिट्रिक
आधार आधारित हाजिरी बने । कार्बन कापी वाली उत्तर पुस्तिका हो और हर आप्शन के बगल
में उत्तर का पहला शब्द लिखा जाए ताकि कापी नहीं बदला जा सके , न ही बाद में दूसरों के द्वारा उसमें बदलाव हो । बेहतर मानिटरिंग के लिए
परीक्षा केंद्र केवल पटना हो । विषयवार परीक्षा के लिए अलग-अलग तिथि चुन लिया जाए
। स्ट्रांग रुम पर सीसीटीवी कैमरा की निगरानी चढ जाए । चाहे तो सरकार NTA को परीक्षा लेने की जिम्मेवारी सौंप सकती है ।
10. असिस्टेंट
प्रोफेसर नियुक्त किये जाने के पांच वर्ष के भीतर पीएचडी करना अनिवार्य बनाया जा
सकता है । नेट के साथ पीएचडी करने वाले चयनित असिस्टेंट प्रोफेसर को वेतन में एक
इंक्रिमेंट का लाभ दिया जा सकता है ।
11.
बीपीएससी की परीक्षाओं में पूछे गए
सवालों में से के कुछ के विकल्पों के सही-गलत को लेकर हाईकोर्ट जाने का रिवाज रहा
है । इसके लिए प्रश्न पत्र बनाने वालों की यूपीएससी परीक्षा पद्धति से अपडेट न
रहना है । अत: विवि के असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली के लिए होने वाली प्रतियोगिता
परीक्षा को इस विवाद से बचाना होगा । विवादास्पद सवालों से बचने के लिए यूपीएससी
की 2011 के पहले की आप्शनल पेपर के पीटी एक्जाम के सवालों, नेट के विषयवार पेपर के सवालों को चुना जा सकता है ।
श्रीमान, बहाली वैसे भी अनियमित रहती है । इतनी बड़ी रिक्तियां आने वाले निकट भविष्य
में बिहारी छात्रो को प्राप्त नही होगी ।
यह हम मेधावी किंतु बैकग्राउंडलेस बिहारियों के लिए उच्च शिक्षा में
प्राप्त सबसे बड़ा अवसर होगा । अत: आप हस्तक्षेप अवश्य करें । आपका हस्तक्षेप नई
शिक्षा नीति की भावना के अनुरुप होगा ।
निवेदक
(जेपी हंस)
अध्यक्ष, बिहार राज्य नेट-पीएचडी उतीर्ण छात्र
संघ, पटना
28 June, 2019
बिहार की सहायक प्रोफेसर के अभ्यर्थियों की मांग ।
सम्पूर्ण भारत में सहायक
प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा से होती है पर हमारे बिहार राज्य ने इस अति
उच्च योग्यता वाले पद को भरने में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ” को भर्ती का आधार बनाया है । हमारे देश में कई बोर्ड और कई विश्वविद्यालय
है, जिनके मार्किंग पैटर्न में बहुत अंतर है- जैसे कठिन सिलेबस के कारण बिहार
बोर्ड के टॉपर को भी सी.बी.एस.ई (C.B.S.E) बोर्ड और
आई.सी.एस.ई (I.C.S.E) बोर्ड के औसत छात्रों से भी 20% तक कम नम्बर मिलता है । इसके वजह से सहायक प्रोफेसर की बहाली में बिहार
के विद्यार्थियों को कम अवसर मिलता है । बिहार के लगभग सभी विश्वविद्यालय भी भारत
में सबसे कम मार्किंग के लिए जाने जाते हैं । इससे भी बड़ा अंतर समेस्टर और ऐनुअल
एक्जाम सिस्टम के प्राप्तांकों में है । ग्रेडिंग और नन ग्रेडिंग के बीच
प्राप्तांकों में तो और ज्यादा अंतर है- उदाहरणस्वरूप बिहार के विश्वविद्यालय,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और
जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में जहां 65% पर गोल्ड मेडलिस्ट
हो जाता है वहीं बनारस हिन्दी विश्वविद्याल (BHU) और जवाहरलाल
नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में एक सामान्य छात्र भी 80% तक अंक पाता है । ऐसे में प्रतियोगिता परीक्षा के जगह “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ” के आधार पर भर्ती घोर
अन्यायपूर्ण और अवसर की समानता के खिलाफ है ।
“डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ” प्रणाली भर्ती की सबसे पुरानी पद्धतिओं में से एक है, जिसका प्रत्येक
राज्य इनमें व्याप्त खामियों को देखते हुए इसके जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित
करवा रहें है । फिर हमारा राज्य क्यों न पुरानी पद्धति को त्याग कर नयी पद्धति- प्रतियोगिता
परीक्षा को अपनाये, क्योंकि बिहारी कठिन मेहनत और लगन के लिए जाने जाते है और किसी
भी प्रतियोगिता परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा सफलता हासिल करते हैं ।
मध्यप्रदेश, ओडिसा, हरियाणा, उत्तरप्रदेश,
राजस्थान और हिमाचल प्रदेश आदि अन्य अनेक राज्य खुली प्रतियोगिता
परीक्षा का आयोजन करवाते है एवं अपने-अपने राज्य का डोमिसाईल
नीति भी लागू करते है, जिससे वहां
के मूल निवासी को नियुक्ति में ज्यादा अवसर मिलता है । उसी तरह अपने राज्य बिहार
से भी खुली प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति की मांग
करते हैं ताकि शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन हो सके, साथ ही अपने राज्य की डोमिसाईल नीति को लागू किया जाये, जिससे यहाँ के मूल निवासी को नियुक्ति में ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकें
। बिहार में अब तक जितने सहायक प्रोफेसर की भर्ती हुई है, उसमें
बिहार के बाहर के विद्यार्थी ज्यादा से ज्यादा नियुक्त हुए हैं । वें एक बार
नियुक्त तो होते हैं पर इस ताक में रहते हैं कि अपने स्टेट में किस तरह जाऊं,
वे मन से यहां ड्यूटी भी नहीं करते हैं और अततः वें यहाँ के
भैकेन्सी बर्बाद कर अपने स्टेट चले जाते हैं । अगर डोमिसाईल नीति लागू होता है तो
बिहार के विद्यार्थियों को ज्यादा से ज्यादा अवसर मिलेगा और वे मन से यहां ड्यूटी
भी करेंगे । कहीं और जगह जाने की ताक में भी नहीं रहेंगे । बिहार के विद्यार्थी
अहिंदी-भाषी राज्यों में जा ही नहीं सकते, क्योंकि वे मूल
भाषा का ज्ञान माँगते हैं और बाकि बचे हुए हिंदी-भाषी राज्य भी मूल निवासियों को
प्राथमिकता देते हैं । यहाँ तक कि राज्य के बाहर के छात्रों के लिए उम्र अत्यंत कम
रखी जाती है । ऐसे में बिहारी छात्र जाएँ तो कहाँ जाएँ? क्या मज़दूर बनने को ही हम अपनी नियति मान लें? अगर डोमिसाईल नीति लागू होती हैं तो यहाँ के छात्रों को ज्यादा से ज्यादा
अवसर मिलेगा और यहाँ के बेरोजगार युवकों की समस्या भी दूर होगी ।
अंत
में, जो एकेडमिक में कम मार्क्स प्राप्त करते हैं, क्या उनमें गुणवता की कमी होती
है ? वे भी उच्च मार्क्स प्राप्त करने वाले की भाँति इस क्षेत्र में कुछ करना
चाहते है, लेकिन पूर्व में ली गई भर्ती प्रणाली(एकेडमिक सिस्टम) से ऐसे कई गुणवता
वाले विद्यार्थियों को छँटनी कर दी गई थी । अगर
बिहार सरकार इस पुरानी पद्धति “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ” प्रणाली के जगह खुली प्रतियोगिता परीक्षा द्वारा भर्ती करती है तो बिहार
के अभ्यर्थियों को इस नियुक्ति में ज्यादा
से ज्यादा अवसर मिल सकती है ।
24 June, 2019
सहायक प्रोफेसर की भर्ती में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ” सिस्टम की जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने के संबंध में ।
माननीय ......................................
.....................................................
विषयः-
सहायक प्रोफेसर की भर्ती में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
सिस्टम की जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने
के संबंध
में
।
महोदय,
सम्पूर्ण भारत में सहायक प्रोफेसर की
भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा से होती है पर हमारे बिहार लोक सेवा आयोग ने इस अति
उच्च योग्यता वाले पद को भरने में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
को भर्ती का आधार बनाया है । महोदय, हम निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर बिहार में
भी सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर करने की मांग करते हैं
।
1.
महोदय, हमारे देश में कई बोर्ड
और कई विश्वविद्यालय है, जिनके मार्किंग पैटर्न में बहुत अंतर है- जैसे कठिन
सिलेबस के कारण बिहार बोर्ड के टॉपर को भी सी.बी.एस.ई
(C.B.S.E) बोर्ड और आई.सी.एस.ई (I.C.S.E)
बोर्ड
के औसत छात्रों से भी 20% तक
कम नम्बर मिलता है । इसके वजह से सहायक प्रोफेसर की बहाली में बिहार के
विद्यार्थियों को कम अवसर मिलता है ।
2.
महोदय, बिहार के लगभग सभी
विश्वविद्यालय भी भारत में सबसे कम मार्किंग के लिए जाने जाते हैं । इससे भी बड़ा
अंतर समेस्टर और ऐनुअल एक्जाम सिस्टम के प्राप्तांकों में है । ग्रेडिंग और नन
ग्रेडिंग के बीच प्राप्तांकों में तो और ज्यादा अंतर है- उदाहरणस्वरूप बिहार के
विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
(DU) और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में जहां 65%
पर
गोल्ड मेडलिस्ट हो जाता है वहीं बनारस हिन्दी विश्वविद्याल (BHU)
और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में
एक सामान्य छात्र भी 80% तक
अंक पाता है । ऐसे में प्रतियोगिता परीक्षा के जगह “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
के आधार पर भर्ती घोर अन्यायपूर्ण और अवसर की समानता के खिलाफ है ।
3.
महोदय, बिहार में सहायक
प्रोफेसर की नियुक्ति में इसी “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
नियम को आधार बनाया जाता रहा है, जिसके कारण बिहारी छात्रों को कम अवसर मिल पाता
है । चूंकि बिहार बोर्ड और बिहार के यूनिवर्सिटीज भारत के सबसे कम मार्किंग वाले
बोर्ड और यूनिवर्सिंटी है ।
4.
महोदय, “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
प्रणाली भर्ती की सबसे पुरानी पद्धतिओं में से एक है, जिसका प्रत्येक राज्य इनमें
व्याप्त खामियों को देखते हुए इसके जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित करवा रहें है ।
फिर हमारा राज्य क्यों न पुरानी पद्धति को त्याग कर नयी पद्धति- प्रतियोगिता
परीक्षा को अपनाये, क्योंकि हम बिहारी कठिन मेहनत और लगन के लिए जाने जाते है
और किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा सफलता हासिल करते हैं ।
अतः
हम महोदय से प्रार्थना करते हैं कि इस पुरानी पद्धति “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
प्रणाली के जगह खुली प्रतियोगिता परीक्षा
द्वारा भर्ती कराने की कृपा करें, ताकि बिहार के सभी विद्यार्थियों को इस
नियुक्ति में ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकें।
निवेदक
निवेदक
बिहार
के सहायक प्रोफेसर के योग्य समस्त छात्र-छात्राएं
26 May, 2019
सहायक प्रोफेसर की भर्ती में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ” प्रणाली की जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने एवं डोमिसाइल नीति लागू करने के संबंध में ।
माननीय...................
बिहार
विषयः- सहायक प्रोफेसर की भर्ती में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
सिस्टम
की जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने एवं
डोमिसाईल
नीति लागू करने के संबंध में ।
महोदय,
सम्पूर्ण भारत में सहायक प्रोफेसर की
भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा से होती है पर हमारे बिहार लोक सेवा आयोग ने इस अति
उच्च योग्यता वाले पद को भरने में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
को भर्ती का आधार बनाया है । महोदय, हम निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर बिहार में
भी सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर करने एवं बिहार की
अपनी डोमिसाईल नीति लागू करने की मांग करते हैं ।
1.
महोदय, हमारे देश में कई बोर्ड
और कई विश्वविद्यालय है, जिनके मार्किंग पैटर्न में बहुत अंतर है- जैसे कठिन
सिलेबस के कारण बिहार बोर्ड के टॉपर को भी सी.बी.एस.ई
(C.B.S.E) बोर्ड और आई.सी.एस.ई (I.C.S.E)
बोर्ड
के औसत छात्रों से भी 20% तक
कम नम्बर मिलता है । इसके वजह से सहायक प्रोफेसर की बहाली में बिहार के विद्यार्थियों
को कम अवसर मिलता है ।
2.
महोदय, बिहार के लगभग सभी
विश्वविद्यालय भी भारत में सबसे कम मार्किंग के लिए जाने जाते हैं । इससे भी बड़ा
अंतर समेस्टर और ऐनुअल एक्जाम सिस्टम के प्राप्तांकों में है । ग्रेडिंग और नन
ग्रेडिंग के बीच प्राप्तांकों में तो और ज्यादा अंतर है- उदाहरणस्वरूप बिहार के
विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
(DU) और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में जहां 65%
पर
गोल्ड मेडलिस्ट हो जाता है वहीं बनारस हिन्दी विश्वविद्याल (BHU)
और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में
एक सामान्य छात्र भी 80% तक
अंक पाता है । ऐसे में प्रतियोगिता परीक्षा के जगह “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
के आधार पर भर्ती घोर अन्यायपूर्ण और अवसर की समानता के खिलाफ है ।
3.
महोदय, बिहार में सहायक
प्रोफेसर की नियुक्ति में इसी “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
नियम को आधार बनाया जाता रहा है, जिसके कारण बिहारी छात्रों को कम अवसर मिल पाता
है । चूंकि बिहार बोर्ड और बिहार के यूनिवर्सिटीज भारत के सबसे कम मार्किंग वाले
बोर्ड और यूनिवर्सिंटी है ।
4.
महोदय, “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
प्रणाली भर्ती की सबसे पुरानी पद्धतिओं में से एक है, जिसका प्रत्येक राज्य इनमें
व्याप्त खामियों को देखते हुए इसके जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित करवा रहें है ।
फिर हमारा राज्य क्यों न पुरानी पद्धति को त्याग कर नयी पद्धति- प्रतियोगिता
परीक्षा को अपनाये, क्योंकि हम बिहारी कठिन मेहनत और लगन के लिए जाने जाते है
और किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा सफलता हासिल करते हैं ।
5.
महोदय, मध्यप्रदेश, ओडिसा,
हरियाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश आदि अन्य अनेक राज्य खुली प्रतियोगिता
परीक्षा का आयोजन करवाते है एवं अपने-अपने राज्य का डोमिसाईल नीति भी लागू
करते है, जिससे वहां के मूल निवासी को नियुक्ति में ज्यादा अवसर मिलता है, उसी तरह
हमारा राज्य बिहार से भी खुली प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर सहायक प्रोफेसर की
नियुक्ति की उम्मीद करते हैं ताकि शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन हो सके,
साथ ही अपने राज्य की डोमिसाईल नीति को लागू किया जाये, जिससे यहाँ के मूल निवासी
को नियुक्ति में ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकें ।
6.
महोदय, बिहार में अब तक जितने
सहायक प्रोफेसर की भर्ती हुई है, उसमें बिहार के बाहर के विद्यार्थी ज्यादा से
ज्यादा नियुक्त हुए हैं । वें एक बार नियुक्त तो होते हैं पर इस ताक में रहते हैं
कि अपने स्टेट में किस तरह जाऊं, वे मन से यहां ड्यूटी भी नहीं करते हैं और अततः
वें यहाँ के भैकेन्सी बर्बाद कर अपने स्टेट चले जाते हैं । अगर डोमिसाईल नीति लागू
होता है तो बिहार के विद्यार्थियों को ज्यादा से ज्यादा अवसर मिलेगा और वे मन से
यहां ड्यूटी भी करेंगे । कहीं और जगह जाने की ताक में भी नहीं रहेंगे ।
7.
महोदय, हमलोग अहिंदी-भाषी राज्यों
में जा ही नहीं सकते, क्योंकि वे मूल भाषा का ज्ञान माँगते हैं और बाकि बचे हुए
हिंदी-भाषी राज्य भी मूल निवासियों को प्राथमिकता देते हैं । यहाँ तक कि राज्य के
बाहर के छात्रों के लिए उम्र अत्यंत कम रखी जाती है । ऐसे में हम बिहारी छात्र
जाएँ तो कहाँ जाएँ? क्या मज़दूर बनने को ही
हम अपनी नियति मान लें?
महोदय, अगर डोमिसाईल नीति लागू होती हैं तो यहाँ के छात्रों को ज्यादा से ज्यादा
अवसर मिलेगा और यहाँ के बेरोजगार युवकों की समस्या भी दूर होगी ।
अतः
हम महोदय से प्रार्थना करते हैं कि इस पुरानी पद्धति “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
प्रणाली के जगह खुली प्रतियोगिता परीक्षा
द्वारा भर्ती कराने एवं बिहार की अपनी डोमिसाईल नीति
लागू करने की कृपा करें, ताकि बिहार के निवासी को इस नियुक्ति में ज्यादा से
ज्यादा अवसर मिल सकें ।
निवेदक
निवेदक
बिहार
के सहायक प्रोफेसर के योग्य समस्त छात्र-छात्राएं
12 September, 2016
हिंदी भाषा का इतिहास और विकास
हिन्दी मूलतः फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- हिन्दी का या
हिंद से सम्बन्धित । हिन्दी शब्द की उत्पति सिन्धु-सिंध से हुई है, क्योंकि ईरानी
भाषा में ‘स’ को ‘ह’ बोला जाता है । इस प्रकार हिन्दी शब्द वास्तव
में सिन्धु शब्द का प्रतिरूप है । कालांतर में हिंद शब्द सम्पूर्ण भारत का पर्याय
बनकर उभरा । इसी हिंद से हिन्दी शब्द बना ।
आज हम जिस भाषा को हिन्दी
के रूप में जानते है, वह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है । आर्य भाषा का
प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत हैं, जो साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी । वैदिक भाषा
में वेद, संहिता एवं उपनिषदों-वेदांत का सृजन हुआ है । वैदिक भाषा के साथ-साथ ही
बोलचाल की भाषा संस्कृत थी, जिसे लौकिक संस्कृत कहा जाता है । संस्कृत का विकास
उत्तरी भारत में बोली जाने वाली वैदिककालीन भाषाओं से माना जाता है । अनुमानतः
8वीँ शताब्दी ई.पू. में इसका प्रयोग साहित्य में होने लगा था । संस्कृत भाषा में
ही रामायण तथा महाभारत जैसे ग्रन्थ रचे गये । वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, अश्वघोष,
भारवी, माघ, भवभूति, विशाख, मम्मट, दंडी तथा श्रीहर्ष आदि संस्कृत की महान
विभूतियाँ है । इसका साहित्य विश्व के समृद्ध साहित्य में से एक है । संस्कृतकालीन
आधारभूत बोलचाल की भाषा परिवर्तित होते-होते 500 ई.पू के बाद तक काफी बदल गई, जिसे
पाली कहा गया । महात्मा बुद्ध के समय में पालि लोक भाषा थी और उन्होने पालि के
द्वारा ही अपने उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया । यह भाषा ईसा की प्रथम ईसवी तक रही
।
पहली ईसवी तक आते-आते
पालि भाषा और परिवर्तित हुई, तब इसे प्राकृत की संज्ञा दी गई । इसका काल पहली ई.
से 500 ई. तक है । पालि की विभाषाओं के रूप में प्राकृत भाषाये-पश्चिमी, पूर्वी,
पश्चिमोत्तरी तथा मध्य देशी अब साहित्यिक भाषाओं के रूप में स्वीकृत हो चुकी थी,
जिन्हें मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री, पैशाची, ब्रांचड़ तथा अर्धमागधी भी कहा जा
सकता है ।
आगे चलकर प्राकृत भाषाओं
के श्रेत्रीय रूपों से अपभ्रंश भाषाये प्रतिष्ठित हुई । इनका समय 500 ई. से 1000
ई. तक माना जाता है । अपभ्रंश भाषा साहित्य के मुख्यतः दो रूप मिलते है-पश्चिमी और
पूर्वी । अनुमानतः 1000 ई. के आसपास अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक
आर्य भाषाओं का जन्म हुआ । अपभ्रंश से ही हिंदी भाषा का जन्म हुआ । आधुनिक आर्य
भाषाओं का जन्म अपभ्रंशों के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से इस प्रकार माना जा सकता
है-
अपभ्रंश- आधुनिक
आर्य भाषा तथा उपभाषा
पैशाची- लहंदा, पंजाबी
ब्रांचड़- सिन्धी
महाराष्ट्री- मराठी
अर्धमागधी- पूर्वी हिन्दी
मागधी- बिहारी, बंगला, उड़िया, असमिया
शौरसेनी- पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी,
पहाड़ी गुजराती
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट
है कि हिंदी भाषा का उद्भव अपभ्रंश के अर्धमागधी, शौरसेनी और मागधी रूपों से हुआ
है ।
हिंदी के लिए क्या करें ।
1. स्त्रियां अपनी भाषा और शब्द-चयन को लेकर अपेक्षाकृत अधिक सजग होती
है । यदि वे थोड़ी और जागरूक हो जाए, तो घर की नई पीढ़ी विदेशी भाषा में शिक्षा
प्राप्त करने के बावजूद अपनी भाषा और संस्कृति से बराबर जुड़ी रहेगी ।
2. विद्यालय में भले ही अंग्रेजी अनिवार्य हो, लेकिन घर पर मातृभाषा
में ही बातचीत का नियम बनाए । भोजन, पूजा-पाठ, आत्मीय क्षणों में अंग्रेजी की कड़ी
मनाही हो ।
3. बच्चों को अपनी भाषा में कहानियां-कविताएं पढ़ने के लिए प्रेरित
करें । स्वयं भी पठन-पाठन में शामिल होकर उनमें रूचि जगाए ।
4. बच्चों को अपनी भाषा के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक लाभों के
बारे में बताएं ।
5. बेटी के साथ बेटे को भी रसोई और धार्मिक-सांस्कृतिक रीति-रिवाजों
की शब्दावली से परिचित कराएं ।
6. यदि वे अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करे, तो वैकल्पिक हिंदी शब्द
बताएं ।
7. हिंदी क्षेत्र के निवासी, अहिंदी परिवार के बच्चे दोस्तों से हिंदी
में बोले । इस तरह से भाषा की सजगती बढ़ेगी ।
8. गैर-हिंदी भाषी से बात करें, तो उसकी टूटी-फूठी हिंदी को भी
प्रोत्साहित करें । यदि आप जानते हो कि कोई व्यक्ति हिंदी क्षेत्र का है या हिंदी जानता
है, तो उससे अंग्रेजी में बात न करें । अंग्रेजी उसकी मजबूरी हो सकती है, आपकी
नहीं । वह अंग्रेजी में प्रश्न करे, तो आप हिंदी में उत्तर दें ।
9. ऐसी जगहों पर आप सेवाएं खरीदते है, यानी ग्राहक होते हैं । आप पैसे
देते हैं, सो आपका दर्जी ऊंचा होना चाहिए । लेकिन होता उल्टा है । बैरा और अन्य
कर्मचारी अंग्रेजी में बोलते हैं और आप कमतर न समझ लिया जाएं, इस डर से उसी की
भाषा में बोलने लगते है । इसके बजाय, हिंदी में पूछे हिंदी में बताएं । यह बात
गांठ बांध लीजिए कि यदि आपकी जेब में खर्च करने को पैसे है, तो वे हिंदी ही नहीं,
आपकी स्थानीय बोली को भी झख मारकर समझेंगे ।
10. प्रपत्र, मतलब फॉर्म, चाहे बैंक का मामला हो या जीवनबीमा का,
हिंदी प्रपत्रों की मांग करें । यहां भी नियम और शर्तें हिंदी में पूछे । राशियों
की गणना के लिए हिंदी का सहारा लें । अंग्रेजी अंकों में बताया जाए, तो हिंदी में
पूछे । यहीं नहीं, आप पासबुक और एटीएम पर्ची के लिए भी हिन्दी की मांग कर सकते है
। अपनी भाषा में जानकारी प्राप्त करना आपका मौलिक अधिकार है ।
11. घर खरीदते समय या जमीन या फिर अनुबंध करते समय, उसके दस्तावेज
अपनी भाषा में मांगे । अपनी भाषा में आप नियम-शर्तों को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे
और धोखा खाने या किसी महत्वपूर्ण बात के नजर से चूक जाने के आसार कम ही होंगे ।
इसका एक लाभ यह भी होगा कि करोड़ो-अरबों का कारोबार करने वाले लोग हिंदी की अहमियत
समझेंगे और हिंदी के अच्छे जानकारों को बतौर अनुवादक ही सही, रोजगार मिलेगा ।
12. सफर के दौरान हिंदी की
पत्रिकाएं और समाचार पत्र मांगे, खरीदें । पर्यटन स्थलों और अपनी भाषा में जानकारी
की मांग करें ।
13. एक बात विशेष रूप से जान ले कि जब आप भुगतान करके सेवाएं खरीदते
हैं, तो आप ऊंची स्थिति में होते हैं । कम से कम ऐसी जगहों पर अपनी भाषा को लेकर
संकोच न करें ।
14. आज तकनीकी का दौर है इस दौर में स्मार्टफोन, टबलेट और कम्प्यूटर/लैपटॉप का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है । इसे
इस्तेमाल करते समय भाषा का चयन हिंदी का करें ।
15. आज सोशल साइट का ज्यादा क्रेज बढ़ा है, इस पर अपनी विचार व्यक्त
करते समय हिंदी का प्रयोग करें । हिंदी में भाषा को बदलने के लिए सभी सोशल साइट्स
की सेंटिंग में हिंदी उपलब्ध है ।
16. भारत भी सोशल साईट बनाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है इसलिए
बेहतर होगा विदेशी सोशल साइट के बदले स्वदेशी सोशल साइट का प्रयोग करें । फेसबुक
की जगह शब्दनगरी, ट्विटर की जगह मूषक, व्हाट्सएप्प की जगह जिओ चैट उपलब्ध है, इसकी
प्रयोग करें ।
17. स्मार्टफोन में हिंदी भाषा का प्रयोग करने के लिए प्ले स्टोर में
हिंदी कीबोर्ड के अनेक एप्पस मौजूद है इसे इन्सटॉल कर, सेटिंग में हिंदी का चयन
करें ।
हिंदी से जुड़ी रोचक बातें ।
1. हिंदी की लिपि ‘देवनागरी’ है । यह दो भिन्न शब्दों से बना समस्त पद है । ‘देव’ अर्थात
ईश्वर तथा ‘नागरी’ अर्थात
नगर अथवा शहर से संबंधित । इस शब्द की व्युत्पति यह बताती है कि एक काल विशेष में
यह लिपि एक मुख्य व्यवहार के लिए प्रयुक्त हुई होगी ।
2. वेद, पुराण आदि कई हिंदू धर्मग्रंथ देवनागरी में ही रचे गये है,
जबकि इसके परिवर्तित रूपों में शिलालेख और पट्ट-आलेख उपलब्ध है । अतः इतिहासविदों
तथा पुरातत्वविदों के लिए देवनागरी को जानना-समझना अत्यावश्यक माना गया है ।
3. सातवीं ईस्वीं में हिंदी का आविर्भाव अपभ्रंश से हुआ । 10वीं सदी
के अंत तक इसके स्वरूप में स्थिरता आ गया । ब्रज, अवधी तथा खड़ी बोली आदि हिंदी की
बोलियां अथवा उपभाषाए हैं । हिंदी का वर्तमान साहित्यिक मानक रूप खड़ी बोली पर
आधारित है ।
4. भाषा के विकास-क्रम में
अपभ्रंश से हिंदी की ओर आते हुए भारत के अलग-अलग स्थानों पर अलग भाषा शैलियां
जन्मी । हिंदी उनमें से सबसे अधिक विकसित थी । अतः उसे भाषा की मान्यता मिली ।
अन्य भाषा शैलियां बोलियां कहलायी ।
5. हिंदी का संबंध भारोपीय भाषा परिवार की उपशाखा भारत-ईरानी की
भारतीय आर्यशाखा समूह से है । इसे भारतीय संघ की राजभाषा होने का गौरव प्राप्त है
तथा इसकी लिपि देवनागरी हैं ।
6. हिंदी की विकास यात्रा दिल्ली, कन्नौज और अजमेर क्षेत्रों में हुई
मानी जाती है । पृथ्वीराज चौहान का उस वक्त दिल्ली में शासन था । चंदबरदाई उनके
दरबारी कवि हुआ करते थे । कन्नौज का अंतिम राठौड़ शासक जयचंद था, जो संस्कृत का
बहुत बड़ा संरक्षक था ।
7. जहां काव्य में हिंदी के विकास को छायावादी युग, प्रगतिवादी युग,
प्रयोगवादी युग और यथार्थवादी युग इन चार नामों से जाना गया. वहीं गद्य में इसको,
भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, रामचंद शुक्ल व प्रेमचंद युग तथा अद्यतन युग का नाम
दिया गया ।
8. वर्ष 1850 ई. में ‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग उस भाषा के लिए समाप्त हो गया.
जिसे अब ‘उर्दू’ कहा
जाता है । वर्ष 1900 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में किशोरी लाल गोस्वामी की कहानी ‘इंदुमति’ का प्रकाशन हुआ । यह हिंदी की पहली कहानी मानी
जाती है ।
9. वर्ष 1913 में दादा साहब फाल्के ने ‘राजा हरिश्चंद’ नामक प्रथम हिंदी फिल्म (चलचित्र) का निर्माण
किया । वर्ष 1931 में हिंदी की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ परदे पर आयी ।
10. हिंदी भाषा के लिए इस शब्द का प्राचीनतम प्रयोग सरफुद्दीन यज्दी
के ‘जफरनामा’ (1924) में मिलता है ।
11. अमीर खुसरो के ‘खालीक बारी’ (1283) में पहली बार हिंदी का प्रयोग केवल पांच
बार हुआ है, जबकि हिंदवी का तीस बार प्रयोग हुआ है ।
12. 1826 ई. में पहला हिंदी समाचार पत्र ‘उदंत मार्तण्ड’ निकला ।
13. प्राप्त प्रमाणों में 933 ई. की ‘श्रावकाचार’ नामक पुस्तक अपभ्रंश हिंदी का पहला ग्रंथ है,
परन्तु अमीर खुसरो हिंदी के वास्तविक जन्मदाता थे, जिन्होंने 1283 में खड़ी बोली
हिंदी को इसका नाम हिन्दवी दिया । तब से ही यह हिन्दवी, हिन्दी बनती गई, बढ़ती,
चढ़ती गई है ।
हिन्दी हूँ मैं....
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल.”
उपरोक्त पंक्तियाँ भारतेंदु हरिश्चंद ने हिंदी के बारे में वैसे समय में लिखी, जब उन्हें लगा कि अब हिंदी के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है । इसी खतरे को भांपते हुए उतरोत्तर समय में 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी । हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
वैसे जो ऐसी कल्पनाएं करके ही खुश होते है कि हिंदी दिवस मनाने वाले मानते हैं कि भाषा का संकट है, तो उन्हें अपनी खुशगहमी दूर कर लेनी चाहिए, क्योंकि यह दिन मनाना संकट का घोतक नहीं, बल्कि अपने ही देश में, सैलानियों की तरह रह रहे लोगों को याद दिलाने का तरीका है कि मुखौटे उतारो और सच्ची जबान बोलो ।
अपनी भाषा बोलने में हिचक होने और आत्म-विश्वास की कमी को कारण हमारे स्वतंत्रता पूर्व और स्वाधीनता प्राप्ति के बाद के शासन की गलत शिक्षा नीतियों के कारण हिंदी उपेक्षा की शिकार रही है । जिस स्वाधीनता संग्राम को भारतीय भाषाओं ने लड़ा, उसी स्वाधीनता के प्राप्ति के बाद उन्हें दरकिनार कर दिया गया । स्वाधीनता प्राप्ति के सारे दस्तावेज ही न केवल अंग्रेजी में हस्ताक्षरित किये गये, बल्कि आधी रात को देश के प्रथम प्रधानमंत्री का स्वाधीनता प्राप्ति का पहला भाषण ही अंग्रेजी में दिया गया । यही वह क्षण था, जहाँ से हिंदी ही नहीं, तमाम भारतीय भाषाओं की दुर्गति शुरू हुई ।
हमारी हिचकिचाहट हमारी मनोवैज्ञानिक दासता में अंतर्निहित है । उसके ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय कारण उतने नहीं है, जितने मनोवैज्ञानिक और वर्गीय कारण हैं । स्वाधीनता के तत्काल बाद स्वाधीनता संग्राम के उन्हीं नेताओं को, जो नई सरकार में मंत्री बनाए गए । उन्हें लगा कि अब वे जनता से कुछ अलग और विशिष्ट हो गए है, क्योंकि अब वे शासक हो चुके थे । उनके सामने यह समस्या हुई कि वे जनता से अलग दिखने के लिए क्या करे, तो उन्हें पहला हथियार मिला भाषा का । उन्होंने तत्काल अपने कामकाज की भाषा के लिए अंग्रेजी को चुन लिया ।
एक क्षेत्र-विशेष के प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले कुछ लोग तो राजनितिक रोटियां सेकने में अरसे से हिंदी विरोद्ध का झंडा उठाते रहे हैं । जब यूपीएससी में हिंदी को लागू करने की बात उठी तो एक बार फिर से सक्रिय रूप से उसके विरोध पर उतर आये थे, अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करने तक पर उन्हें एतराज है यानि अपने ही देश में हिंदी लगातार विरोध के चक्रव्यूह में फंसती और लड़ती रही है । सरकारी स्तर पर उसे आज तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिला है मगर कमाल यह है कि इतने सबके बाद भी हिंदी न हारी, न टूटी, न मरी, न गई अपितु आज दुनियाभर में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शुमार है तथा चीनी या मंडारिन के बाद उसका दूसरा स्थान है । भले ही हिंदी उस देश में ठिटकी खड़ी है, जहाँ सब उसके अपने है, पर एक बेगानेपन से त्रस्त होकर भी उसने उम्मीद नहीं छोड़ी है और हिंदी में जबरदस्त वृद्धि हो रही है, उसकी पठनीयता और साहित्य कुलांचे भर रहा है और कह रहा है “हिन्दी हूँ मैं”।
13 September, 2015
हिन्दी की पोषण
किसी भी देश की राष्ट्रभाषा वहां की ज्ञान, चेतना और चिंतन की मूल
धुरी होती है । ऐसे मे, हमारे ही घर-परिवारों में हिन्दी की उपेक्षा चिंतनीय है ।
अपनी राष्ट्रभाषा को मान देने की आकांक्षा कहीं गुम है । इसीलिए हर परिवार, हर
नागरिक इसे अपना कर्तव्य समझे । जो राष्ट्रभाषा हिन्दी हमारी अस्मिता और
सम्प्रभुता की प्रतीक है वह अपने आंगन में बेगानी-सी खड़ी है । ऐसे में जरूरी है
कि भाषा को समृद्ध करने का प्रयाश हर भारतीय परिवार करे और समाज भी इसमे सकारात्मक
सहयोग दे ।
राष्ट्रभाषा को मान और सम्मान दिलाने का काम केवल सरकारी प्रयासों और
स्कूलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता । समाज और परिवार की भूमिका भी बड़ी अहम है ।
हिन्दी हमारी अपनी राजभाषा और मातृभाषा है । यदि हमारे परिवारों में कोई बच्चा
अंग्रेजी शब्द का गलत उच्चारण भी करता है तो घर-परिवार के लोग उसे टोक देते हैं पर
हिन्दी के मामले में इतनी सतर्कता देखने को नहीं मिलती । हमारा देश हिन्दी भाषी
देश है । लेकिन हिन्दी के प्रति जो रवैया हमारे समाज और परिवार में देखने को मिलता
है वह न केवल दुखद है बल्कि चिंतनीय भी है । मात्र स्कूली शिक्षा और सरकारी
प्रयासों और सेमिनारों से हिन्दी को हमारे मन और जीवन में स्थान नहीं दिला सकता ।
हमारे घरों में बेगानेपन का दंश झेल रही हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहन देने की
शुरुआत और सद्प्रयास हमें अपने घरों के भीतर ही करना होगा । आने वाली पीढियों के
मन में अपनी भाषा के लिए सम्मान और प्रेम हो न कि स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा होने
के नाते उसे जानने और पढ़ने की विवशता ।
हिन्दी का बेगानापन
हिन्दी को कामकाज की भाषा बनाने की कितनी ही दलीलें क्यों न दी जाएं
पर अच्छी नौकरियों में प्राथमिकता अंग्रेजी बोलने और जानने वालों को दी जाती है ।
ये मुट्ठीभर अंग्रेजी पढ़ने और समझने वाले ही पद पाकर देश की दशा और दिशा तय करते हैं
और हिन्दी के जानकार मन मसोस कर रह जाते हैं । आजादी के बाद का हिन्दी को
राष्ट्रभाषा बनाने का सपना आज भी अधूरा है । सरकारी संस्थान हिन्दी को तिरस्कार ही
देते आए है वहीं राजभाषा अधिनियम के चलते भले ही कुछ काम हिन्दी में करना पड़े, पर
अधिकता अंग्रेजी को ही रहती है यानि देश के अंदर आज भी हिन्दी अपनी पहचान और हक
तलाश रही है । इसकी वजह देश की भाषाई अनेकता जैसे कारण भी है यथा मिजोरम,
नागालैंड. तमिलनाडु, आंध्र, कर्नाटक, असम, गोवा और उतर-पूर्वी राज्य खुद को हिन्दी
से नहीं जोड़ पाए है । खेद की विषय है कि राष्ट्रभाषा के नाम पर आज भी देश एकमत
नहीं है मगर समय की मांग है कि शासन के स्तर पर इस दिश में सहमति बनाते हुए सार्थक
और दृढ़तापूर्वक किया जाए ।
हिन्दी का सफरनामा
हिन्दी की संस्कृत
के अति क्लिष्ट स्वरूप और अरबी, फारसी जैसी विदेशी और पाली, प्राकृत जैसी देसी भाषाओं के मिश्रण ने व्यापक आधार प्रदान
किया है । जिस भाषा को इतनी सारी बोलियां और भाषाएं सीचें, उसके गठन की मजबूती का
अंदाजा लगाया जा सकता है । देखा जाए तो पुरातन हिन्दी का अपभ्रंश के रूप में जन्म
400 ई. से 550 ईं. में हुआ जब वल्लभी के शासन धारसेन ने अपने अभिलेश में अपभ्रंश
साहित्य का वर्णन किया । प्राप्त प्रमाणों में 933 ईं. की श्रावकवर नामक पुस्तक
अपभ्रंश हिन्दी का पहला ग्रंथ है परन्तु अमीर खुसरो हिन्दी के वास्तविक जन्मदाता
थे, जिन्होंने 1283 में खड़ी बोली हिन्दी
को इसका नाम हिन्दवी दिया । बस, तब से ही यह हिन्दवी, हिन्दी बनती गई, बढ़ती चढ़ती
गई है और पूरी दुनिया में निरंतर पल्लवित-पुष्पित हो रही है ।
02 February, 2015
21 December, 2014
हिन्दी के साथ अन्याय का पत्र देश के नीति-नियंता के नाम
सेवा में,
1. महामहिम राष्ट्रपति, भारत सरकार, नई दिल्ली
2. माननीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली
3. राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, नई दिल्ली
4. मानव संसाधन एवं विकास मंत्री, भारत सरकार
5. क्षेत्रीय निर्देशक, कर्मचारी चयन आयोग, नई दिल्ली
महोदय,
निवेदनपूर्वक आपका ध्यान इस विषय की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ जिससे हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ अनुचित व्यवहार ही नहीं, वरन राष्ट्रीय अपमान भी हो रहा है । महोदय, कर्मचारी चयन आयोग, जिसका मुख्यालय सीजीओ कम्पलेक्स, लोदी रोड, नई दिल्ली में है । जिसकी देश भर में चार-पाँच क्षेत्रीय शाखाएं है । वह देश भर के लिए कर्मचारियों की भर्ती करती है । कर्मचारी चयन आयोग द्वारा प्रति वर्ष आशुलिपिक हिन्दी ग्रेड-डी और ग्रेड-सी की भर्ती की जाती है, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इस आशुलिपिक हिन्दी के पद की भर्ती के पाठ्यक्रम में हिन्दी से एक भी प्रश्न तक पूछा नहीं जाता है । इसके पाठ्यक्रम है- अंग्रेजी-100 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक । क्या यह हिन्दी भाषी छात्रों को इस पद पर बहाली से दूर रखने का कही षड्यंत्र तो नहीं ? या वे अन्य भाषा को बढ़ावा देना चाहते है? क्या वे हिन्दी दिवस पर केवल गोष्ठियाँ और सप्ताह मनाकर अपने कर्तव्य की ईतिश्री नहीं कर रहे हैं ? क्या यह हिन्दी का अपमान नहीं है कि हिन्दी आशुलिपिक की भर्ती किये जाए और उसमें एक भी प्रश्न हिन्दी से पूछे नहीं जाए ? क्या यह बेहतर नहीं होता कि हिन्दी और अंग्रेजी आशुलिपिक दोनों पद के लिए पाठ्यक्रम में हिन्दी-50 अंक, अंग्रेजी-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक होता । या हिन्दी आशुलिपिक के हिन्दी-100, अंग्रेजी आशुलिपिक के लिए अंग्रेजी-100 और दोनों के लिए सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक हो ।
साथ ही साथ इस तरफ भी ध्यान आकृष्ट करूँ कि कर्मचारी चयन आयोग देशभर में मैंट्रिक लेबल परीक्षा, इन्टर लेबल परीक्षा और स्नातक लेबल परीक्षा आयोजित करती है, लेकिन यहाँ हिन्दी भाषा के साथ इतना भेदभाव है कि इनमें से किसी भी लेबल के परीक्षा में एक भी अंक हिन्दी भाषा से जुड़े प्रश्न नहीं होते हैं । क्या यह राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ अन्याय नहीं है कि केन्द्रीय भर्ती बोर्ड द्वारा इस तरह के भेदभाव किए जाए और उसके नाक के तले बैठे हमारे नीति-नियंता चुपचाप देखते रहे ? क्या केवल हिन्दी दिवस पर देशभर में गोष्ठियाँ और हिन्दी-सप्ताह मनाने से राष्ट्रभाषा अपने मुकाम तक पहुँच सकती है, इस बात पर विचार किया जाए ।
कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली कुछ परीक्षाएं और उनके पाठ्यक्रम इस प्रकार हैः-
मैट्रिक स्तरीय प्रथम परीक्षा-गणित-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक
द्वितीय परीक्षा-अंग्रेजी-50 अंक
इन्टर स्तरीय
पद- क्लर्क, डाटा इन्ट्री ऑपरेटर प्रथम परीक्षा-गणित-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक, अंग्रेजी-50 अंक
द्वितीय परीक्षा-टाईपिंग टेस्ट
इन्टर स्तरीय
पद- आशुलिपिक हिन्दी व अंग्रेजी प्रथम परीक्षा- अंग्रेजी-100 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक
द्वितीय परीक्षा-शॉर्टहैंड का टेस्ट
स्नातक स्तरीय प्रथम परीक्षा-गणित-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक, अंग्रेजी-50 अंक
द्वितीय परीक्षा गणित-100, अंग्रेजी-100
तृतीय परीक्षा-टाईपिंग टेस्ट व इंटरभ्यू (पदानुसार)
अतः इस संबंध में भारतवर्ष के एक नागरिक होने के नाते मेरा कर्तव्य है कि भारतीय संविधान में उल्लेखित हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की अस्मिता और गरिमा को बरकरार रखने हेतु आपका ध्यान दिलाऊँ । कर्मचारी चयन आयोग द्वारा संचालित उपरोक्त परीक्षाओं के पाठ्यक्रमों में हिन्दी को शामिल करें, ताकि राष्ट्रभाषा हिन्दी का विकास हो, हिन्दी का उत्थान हो, हिन्दी भाषियों के साथ न्याय हो ।
आपका भारतवासी,
जयप्रकाश नारायण
ग्राम-दनियाला (पश्चिमी)
डाकघर- शादीपुर
जिला-अरवल (बिहार)
ईमेल- jpn.nsu@gmail.com
ब्लॉग- www.jphans.blogspot.com
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