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17 September, 2021

20 वर्ष की उम्र में 40 देशों की सैर करने वाला एक बिहारी NOMAD SHUBHAM की BIOGRAPHY


                                                            (Photo credit- google)

नमस्कार दोस्तों, मैं आज उस शख्स के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसने न उम्र की परवाह की और न ही पैसों की, बस सोलह-सतरह वर्ष की उम्र में अपनी साहसी मन लेकर दुनिया की सैर करने निकल पड़ा. मतलब बिना पैसों की दुनिया घुमने का सपना पुरा कर रहा है. इस बिहारी शख्स का नाम शुभम कुमार SHUBHAM KUMAR है. इसने 20 वर्ष की आयु तक 40 देशों से ज्यादा की सैर कर चुका है.


परिचय और पढ़ाई

शुभम कुमार का जन्म बिहार के मुंगेर जिले के असरगंज गाँव में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था. इनके पिता एक सरकारी टीचर है और माता हाउस वाईफ है. शुभम नें अपनी प्रारंभिक पढ़ाई गाँव में रहकर किया. बाद की पढ़ाई के लिए पटना आ गये. फिर 10वीं पास करने के बाद Engineering की तैयारी करने के इंजिनियरिंग की फैक्ट्री कोटा पहुँचे. कोटा में रहकर Engineering Entrance की तैयारी की.

कोटा में रहकर Engineering Test Exam देने के लिए भारत के विभिन्न राज्यों में जाते थे जिसके दौरान कई शहरों को Explore करना शुरु किया.

All India Engineering में रिजल्ट आने के बाद NIT कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन वहाँ मन नहीं लगा फिर Engineering की पढाई के लिए जर्मनी की University में अप्लाई किया और वहीं सेलेक्ट हो गये.


दीपिका कुमारी- 27 साल में 54 देशों को धूल चटाने वाली भारतीय महिला.


Travelling का शौक

Talent उम्र और पैसों की प्रतिक्षा नहीं करती बल्कि साहस और जुनून हो तो वह खुद उभर कर बाहर आ जाता है. शुभम कुमार को Travelling का शौक 13 वर्ष की आयु से था पर कोटा में रहकर विभिन्न शहरों में परीक्षा देने के दौरान इस शौक को पूरा करने का भरपूर मौका मिला. इसने YouTube से वरुण वागीश उर्फ Mountain Trekker के Travelling का विडियों देखा उसके बाद इसने महसूस किया कि ट्रेभल करने के लिए किसी भी डिग्री की आवश्यकता नहीं होती.

      इसने कोटा में रहने के दौरान जयपुर, उदयपुर साथ ही राजस्थान के अन्य कई जगहों पर गये फिर शिमला, मनाली, लेह और लद्दाख का सैर किया. इसने यात्री की शुरुआत मार्च 2017 से शुरू किया लेकिन Full time travelling का सफर 2018 से शुरु किया.

Travelling का सफर

      शुभम कुमार ने वैसे तो Travelling का सफर 2017 में अपने देश के विभिन्न शहरों से किया, 2018 से फूल टाइम Travelling का सफर शुरु किया लेकिन अपने देश से बाहर पहली बार Nepal, Bhutan को Explore किया.

      फिर भारत से बांग्लादेश, बांग्लादेश से म्यानमार, म्यानमार से थाइलैंड, थाईलैंड से लाओस, लाओस से चाईना, चाइना से मंगोलिया, मंगोलिया से रशीया, रशीया से किर्गीस्तान, किर्गीस्तान से कजागिस्तान, कजागिस्तान से उज्जबेगिस्तान का सफर किया और वहाँ से वापस भारत लौटे. उसके बाद पुनः भारत से दक्षिण अफ्रीका By land का सफर तय किया. जिसमें दुनिया के 3 continents और 40+ देश शामिल है और आज भी विभिन्न देशों में Travelling कर रहे हैं.


                                (photo credit- Google)

      इसने hitchhiking (हीचेकिंग का मतलब एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए लोगों से लिफ्ट मांगना होता है) के माध्यम से रशीया के याकूटिया के पास ओम्याकोन Oymyakon नामक एक जगह पर पहुँचे जहाँ का तापमान -71 डिग्री सेल्सियस चला जाता है. Oymyakon जाने के पहले वहाँ के बारे में youtube से एक Documentry देखी और साहस कर उस स्थान का भ्रमण किया; यह जानते हुए भी कि यह विश्व की सबसे ठंडी जगह है.

               

                                      (Video credit: Nomad Shubham youtube channel)

Travelling का खर्चा

      पोलो कोलो ने कहा है- यात्रा पैसों की नहीं बल्कि साहस की बात है यह कथन बिल्कुल सही है पर साहब बातों से पेट नहीं भरता. पेट भरने के लिए पैसो की जरूरत होती है. जब इसने Travelling शुरू किया था तब Skype Platform की मदद से Tuition पढाया, Freelancer का काम शुरु किया, कभी-कभी होटल का Review दे दिया करते थे जिससे कुछ आमदनी हो जाया करता था.  लेकिन इतना से World Travelling संभव नहीं था तब इन्होंने चार देशों के सफर करने के बाद अपना Youtube Channel बनाया.

      यूट्यूब चैनल बनाने का एक मकसद यह भी था कि दुनिया के बारे में बताना कि दुनिया में सारे लोग चोर, बदमास, आतंकवादी और माओवादी नहीं होते बल्कि अधिकांश लोग बहुत अच्छे होते है. जैसा कि हमारे देश के गोदी मीडिया GODI MEDIA OF INDIA चिख-चिख कर बताती है. इसने 2019 में अपना पहला वीडियों यूट्यूब पर अपलोड किया. आज इनके यूट्यूब चैनल के 15 लाख Subscriber और 20 लाख Viewer बन चुके हैं.


        भोजपुरी महफिल की अस्मिता बचाने आई नेहा सिंह राठौड़.


            शुभम कुमार ज्यादातर यात्रा लोगों से लिफ्ट लेकर करते हैं जिसमें कोई पैसा नहीं देना पड़ता. जिसे ट्रेभलिंग की भाषा में Hitchhiking हिचैकिंग कहते हैं. वह कभी-कभी बस स्टैंड, पेट्रोल-पंप या टेंट लगाकर सो जाते हैं जिसे रहने का खर्चा बच जाता है. कभी-कभी किसी देश के लोग रहने-खाने का खर्चा उठा लेते हैं या अपने घर में आश्रय देकर खर्च उठाते हैं जिसे Couch Suring कहते हैं. Couch Suring का मतलब आप मुफ्त में उस शहर के रहने वालों के साथ रह सकते हैं जिससे travelling करने वालों का खर्चा बच जाता है.

                                                        (photo credit: Google)

सम्मान-पुरस्कार

      शुभम कुमार को भारत के वर्तमान राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने फोन कर साहस  भरी अभियान की तारीफ किया और मनोबल बढ़ाया.

      Public Transport और Hitchhiking के माध्यम से एक लाख किलोमीटर से ज्यादा का Travelling करने के लिए Genius Book of World Records में नाम दर्ज हो गया.

      विश्व के सबसे ठंडे प्रदेश रशीया के याकूटिया के पास ओम्याकोन Oymyakon में जाने वाले चौथे भारतीय बने हैं.

वर्तमान कैरियर

      वर्तमान में Distance से ग्रेजुएशन करते हुए World Tour  के Passion को जारी रखा है. वह सोशल मीडिया पर NOMAD SHUBHAM  के नाम से जाने जाते हैं. NOMAD का अर्थ घुमंतू या घुमने वाला होता है. इनके  Youtube चैनल का नाम Nomad Shubham हैं. Instagram  ID @nomadshubham  हैं.

 

                    (snapshot credit: Nomad Shubham youtube channel)

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13 September, 2021

सरकारी नौकरी के 11 साल: कुछ अनछुए यादें. (Part-1) Eleven years of government job of Jai Prakash Narayan or JP HANS



                                                     (11 साल के सफर के साथी मैं कुणाल, दत्ता और विनय)

              13 सिंतबर, 2010, दिन सोमवारमेरे जिंदगी का वह सुनहरा पल जिसका सबको इंतजार रहता है। सरकारी नौकरीहाँ! इसी दिन मैंने सरकारी नौकरी जॉइन किया था। वर्षो के त्यागतपस्यामेहनत और लगन के बदौलत मैंने दिल्ली नगर निगम में क्लर्क के पद का कार्यभार संभाला था। इस विभाग में जॉइन तो मैं कुछ दिन पहले भी कर सकता था पर मेरी माँ अस्पताल में भर्ती थी जिसके वजह से जोइनिंग में देर हो गयी। हमारे कई दोस्त हमसे पहले जॉइन कर चुके थे। मेरा जोइनिंग लेटर घर पर नहीं आया था पर हमें पता था कि जोइनिंग लेटर जारी हो रहा है। मैंने विभाग के केंद्रीय संस्थापना विभाग के कर्मचारियों से मिलकर 11 सितंबर को जोइनिंग लेटर प्राप्त किया और 13 सिंतबर, 2010 को कार्यभार संभाल लिया था।

जोइनिंग के पहले का संघर्ष: 

        मैं 10 सिंतबर को दिल्ली पहुँचा था। इससे पहले दिल्ली दो बारएक बार एग्जाम और एक बार मेडिकल टेस्ट के लिए आया था। समझिये मेरे लिए दिल्ली एक अनजान शहर था। मैं दिल्ली रेलवे स्टेशन से बस पकड़कर लाजपत नगर पहुँचा। लाजपत नगर में हमारे भैया रहते थे। उन्होंने बताया था कि आप लाजपतनगर बस से आ जाइए। लेकिन लाजपत नगर इतना बड़ा होगा यह नहीं मैंने समझा था। बहुत तेजी से बारिश हो रही थीमेरे लाजपत नगर पहुचते-पहुचते करीब छह बजे चुके थे। एक अनजान जगहशाम होने पर था और ऊपर से बारिश छूटने का नाम नहीं ले रहा था। मैं लाजपत नगर वाली बस स्टैंड पर उतराभींगते हुए सामने किसी दुकान में पहुँचा। वहां पहुँचकर भैया को फोन किया। भैया अपने ड्यूटी से आकर लाजपत नगर बस स्टैंड के सामने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के पास रुके हुए थे पर तेज बारिश के चलते अपने रूम N-38डबल स्टोरीनिर्मलपुरी लाजपतनगर को जा चुके थे। एक अनजान शहरशाम का समयतेज बारिशऊपर से मेरे कीपैड मोबाइल के बैटरी जवाब दे रहा था। भैया बार-बार N-38 डबल स्टोरी आने को बोल रहे थे पर बारिश के चलते साफ सुनाई नहीं आ रही थी। दुकान वाले ने बैग ढकने के लिए एक प्लास्टिक देकर मुझे चलता किया। दुकान वाले मुझे अनजान समझकर ज्यादा देर ठहराना उचित नहीं समझ रहे थे। भैया से बार-बार बात करने से यह बात समझ आ गयी थी कि हमें ज्यादा दूर नहीं जाना है। मेरा पूरा जूता भींग चुका था। लाजपत नगर फ़्लाईओवर के पास पानी जमा हो गया थाजिससे भींगे जूते से चलना मुश्किल हो गया फिर किसी तरह उनके रूम में पहुँचा। डर इसी बात का था कि यह शहर मेरे लिए अनजान थाशाम का समय हो गया थातेज बारिश हो रही थी और मोबाइल के बैटरी खत्म होने के कगार पर था। इस परिस्थिति में अगर भैया के रूम नहीं मिलते तो क्या करता?


       खैरअगले दिन पुरानी दिल्ली टाउन हॉल जाकर केंद्रीय संस्थापना विभाग से जोइनिंग लेटर लिया और सोमवार 13 सितम्बर को वही लाजपत नगर में स्थित MCD के Assessment & Collection Department (House Tax Department) में जोइनिंग दिया। जोइनिंग से पहले अपने मित्र ANIL DUTTA, Uttar Pradesh से मिला जो कि 30 अगस्त, 2010 को MCD के IT सेल में जॉइन किया था। आफिस के जोइनिंग का हालचाल इसी से पता करता था। मजे की बात है कि मैं पहले दिन जब दिल्ली आया था तो उसी ऑफिस के गेट से होकर गुजरा था फिर भी मुझे इस ऑफिस के बारे में पता नहीं चला।


         13 सितम्बर को मेरे साथ एक दोस्त Vinay Kumar, Hajipur, Bihar और दिल्ली के एक Geeta Kumari भी उसी पोस्ट पर जॉइन किया। जोइनिंग के बाद कुछ दिनों के बाद पोस्टिंग मिला था तब तक इधर-उधर घूमकर मौज करते रहे बाद में जब पोस्टिंग हुआ तो मेरा और Geeta Kumari, Delhi को MVC (Municipal Valuation Committee) और Vinay Kumar, Hajipur को DCC (Dishonour Cheque Cell) मिला। 20 सितम्बर को बिहार से एक और क्लर्क जॉइन किया Krishan Kant Kunal. मैंविनय और कुणाल (तीनो बिहारी) मिलकर लाजपत नगर 'गढ़ीमें रहने लगा। बाद में दो दिनों के ट्रेनिंग हुआ जिससे बहुत सारे दोस्त बन गया। नवल किशोरशेखर सुमनजाकिर हुसैनजगदीशराजकुमार. घनश्यामजितेंद्रअभिषेक. कई दोस्तों के नाम भी भूल चुका हूँ क्योंकि मेरे MCD से विदा लेने से पहले दूसरे विभाग में जा चूके थे और कई से अब संपर्क नहीं है।

ऑफिस जोइनिंग के बाद का संघर्ष:

        मुझे और गीता कुमारी को एक ही सेल में पोस्टिंग हुआ। जोइनिंग के बार MVC के PA ने मुझे वहां के कार्य के बारे में बताया कि यह सेंसिटिव जगह हैयहां दिल्ली के कॉलोनियों का categorization होता है। जिससे टैक्स तय होता है। बाहर किसी को मत बतानाअन्यथा नौकरी चली जायेगी। 

        एक दिन बहुत मजेदार हुआ। मेरे एडमिन के Dy A&C. झा सर थे। उनके PA ने अपने चैम्बर में बुलायायह चैम्बर डिप्टी के चैम्बर के आगे था। वहां गीता कुमारी पहले से बैठी थी। डिप्टी के PA ने मुझे बोला कि आपको हिंदी ट्रांसलेट के बारे में जानकारी है सो कुछ मैटर ट्रांसलेट करना हैजबकि मेरा पोस्टिंग MVC में था और क्लर्क के पोस्ट में आया था। मैंने PA को जवाब दियानहीं! 'मुझे नहीं आता है।इतने में PA गुस्सा हो गया, 'गीता तो कह रही है आपको आता है।मैंने कहा जैसे आप DICTIONARY से मीनिंग खोजकर ट्रांसलेट कीजियेगा वैसे ही मैं करूँगा। इतने में PA गुस्सा से लाल हो गया और कहने लगा, 'नया-नया आया है और जबान लड़ता है ओ भी डिप्टी के चैम्बर में।मैंने कुछ नहीं बोला और सीधा अपने सीट पर चला आया और मन ही मन कहा, 'जो करना है कर लोमैं क्लर्क हूँकोई ट्रांसलेटर नहीं।'

         गलत का मतलब गलत होता है। मुझसे गलती बर्दाश्त नहीं होती। जब ऑफिस जॉइन किया तो सभी क्लर्क को आई.डी कार्ड मिलना थाआईडी देने वाला केयरटेकर कुछ पैसा ऐठने के चक्कर में था तब मैंने केयरटेकर के खिलाफ एक लंबा-चौड़ा शिकायती पत्र लिखा जिससे हमारे दोस्त अनिल दत्त ने यह कहकर फाड़ दिया कि अभी-अभी नौकरी जॉइन किया है और पुराने आदमी को शिकायत करोगेकही तुम्हे नुकसान न पहुँचा दे। फिर जैसे-तैसे आईडी कार्ड मिला।

         सभी नए क्लर्को को नौकरी करते हुए एक साल से अधिक समय हो गया था फिर भी सैलरी नहीं मिल रही थी। वजह थी MCD की एक शर्त की जब तक सभी क्लर्को का पोलिस वेरिफिकेशन नहीं हो जाता तब तक सैलरी नहीं मिलेगी। जैसे-जैसे वेरिफिकेशन होकर डोजियर आता वैसे सैलरी चालू हो जाती। मेरा और कई दोस्तों को डोजियर आ गया था फिर भी Establishment Section वाले सैलरी जारी नहीं कर रहे थे तब मैंने डिप्टी इस्टैब्लिशमेंट मैडम पुष्पा सैनी की शिकायत लेकर HOD के पास पहुँच। फिर बाद में सैलरी जारी हुआ।

            कुछ ही दिनों के बाद मेरा ट्रांसफर MVC से डायरी-डिस्पैच सेक्शन में राजकुमारी मैडमसुनीता मैडम के साथ कर दिया गया जहां गंगा सहाय जी MCD के वरिष्ठ व्यक्ति का सानिध्य प्राप्त हुआ। लगभग डेढ़ साल के बाद लाजपतनगर हाउस टैक्स मुख्यालय को नई दिल्ली स्थित सिविक सेन्टर ट्रांसफर कर दिया गया। अब हमलोगों का नया ऑफिस सिविक सेन्टर के 20वाँ फ्लोर पर आ गया। हम तीनों साथियों को प्रतिदिन ऑफिस के लिए लाजपत नगर से नई दिल्ली सिविक सेंटर जाना होता था। सिविक सेन्टर में मेरे साथ सुनीता मैडम और जितेंद्र थाजितेंद्र बाद में GRP सेल में चला गया और सुनीता मैडम आरके पुरम ट्रान्सफर करवा ली। अब मैं इस सेक्शन में अकेला था और लेटर ले जाने के लिए मेरे साथ पांच नोटिस सर्वरगंगा सहायरमेश कुमारगोयल जीसचिदानंद जीएक का नाम याद नहीं।


                                                          (सिविक सेन्टर बिल्डिंग)


                                                (सिविक सेंटर में मेरा वर्क स्टेशन)
                     

कुछ दिनों के बाद MCD का तीन भागों में बंटवारा हो गया। मैं और मेरे दोनों पार्टनर का एड्रेस साउथ दिल्ली में होते हुए हम तीनों का ट्रांसफर पूर्वी दिल्ली नगर निगमपटपड़गंज में कर दिया गया। अब हमलोगों का नया ऑफिस पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज हो गया। हमलोगों ने अपना रूम लाजपत नगर 'गढ़ीसे बदलकर लक्ष्मी नगर में ले लिया।

 

                                                       (बीच में डाढी वाले विनोद सर)

पूर्वी दिल्ली नगर निगम के हाउस टैक्स में हमारे नए गुरु 'श्री विनोद कुमार शर्माहेड क्लर्क और मार्गदर्शक "शशिधरण केपी" बने। शशिधरण जी जोइनिग से लेकर रिजाईनिंग तक एक मार्गदर्शक की भूमिका में रहे। यो कहूँ की शशिधरण जीदोनों साथी (कुणाल और विनय) और मैडम पुष्पा सैनी एक ही विभाग में रहकर मेरे जोइनिंग से लेकर रिजाइनिंग तक के साक्षी रहे हैं।

                               

(मैं और विनय कुमार)

गलती के लिए विभागीय दंड:

       मैंने 11 साल के कैरियर में कभी जानबूझकर गलती नहीं की। भले विभाग ने मुझे दो बार MEMO (Show Cause) दिया पर यह विभाग के अपनी नाकामियां छुपाने के लिये दिया था। पहली बार जब मेमो दिया गया था और उसमें जिस दिन के घटना का जिक्र था उस दिन मैं उपस्थित था ही नहीं इसलिए मेरा मेमो खारिज हुआ

        दूसरा मेमो मेरे जोइनिंग के पहले के किसी लेटर के लिए दिया गया था जिससे मुझे कार्यभार संभालने के बाद सहेजने के लिये मिला ही नहीं था। इस तरह दोनों मेमो से मैं मुक्त हुआ।
पहले और दूसरे मेमो की कहानी भी 2012 से 2014 के बीच ही है उसके बाद आज तक कोई SHOW CAUSE या मेमो नहीं मिला।

        मैंने 07 फरवरी, 2014 को पूर्वी दिल्ली नगर निगम के क्लर्क पद से त्याग-पत्र देकर10 फरवरी, 2014 को इनकम टैक्स विभाग, बिहार एवं झारखंड में स्टेनोग्राफर का पद ज्वाईन किया.













अंत में एक यादगार विडियो.



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18 June, 2021

"जाती" और "जाति" की 'ऐसी की तैसी'




हमारे हेडिंग से ही आपको लग रहा होगा कि हम "जाती" और "जाति" की ऐसी की तैसी करने वाले है। मेरे शब्दों में "जाती" का मतलब 'जाती हुई लड़कीं' मतलब बेवफा लड़कीं। वह लड़कीं जो दिलरुबा लड़को का दिल तोड़कर किसी और के साथ रफूचक्कर हो गयी। इधर लड़का उसके प्यार में पागल बेवड़े बनकर घूम रहे हो, सिगरेट की कश पर कश लगाए जा रहा हो, शराब की बोतलों की हाउस सेलिंग-सी दुकान खोल रखा हो, एग्जाम में क्रॉस पर क्रॉस लग रहे हो। उधर बेवफा सनम अपने नए आशिक के साथ घोड़े बेचकर चैन की नींद सो रहा हो, उसे रति-भर भी फिक्र नहीं हो कि हमने सालों तक जिसके साथ इश्क फरमाया ओ कैसे हालातों में जिंदगी गुजार रहा हो? वैसे कहा जाता है कि प्यार में धोखा खाये इंसान दोबारा जिंदगी शुरू कर सकता है, लेकिन उसको कोई सीख देने वाला तो मिले। हालांकि जब प्यार में धोखा खाया इंसान दुबारा जिंदगी शुरू कर दे तो बेवफा सनम की शामत आना तय है। दिलरुबा बाबू साहब बिना खबर लिए छोड़ नहीं सकता। आखिर खबर भी क्यों न ले? प्यार करने में कितने पापड़ बेले और धोखा खाने का इल्जाम भी अक्सर उन्हें ही झेलने पड़ते हैं। लव और धोखा का इल्जाम भी गोली से निकले खोखे की तरह होता है। जो न घर का होता है न घाट का। जिस तरह से गोली से निकलने के बाद खोखे का महत्व नहीं रहता उसी तरह प्यार में धोखा खाये इंसान का जिंदगी जीने का  कोई मकसद नहीं रह जाता। वह अक्सर यही सोचता था कि जिसको से वह प्यार कर रहा था उसके साथ जिंदगी- भर रिश्ते निभाएगा।  एक तरफा प्यार में पागल होना सनकी कहलाता है। प्यार का खम्बा दोनों तरफ से मजबूत होनी चाहिए।

दूसरा शब्द है "जाति". मतलब यों कहें कि भारत एक कृषि प्रधान देश होने के साथ-साथ एक 'जाति' प्रधान देश है। वैसे कोई किसी से प्रधान हो क्या फर्क पड़ता है? जब तक वह व्यवस्था दूसरों का अहित न करें। भारत के इतिहास में आज तक जितना "जाति व्यवस्था" ने भारतीय समाज को अहित किया है उतना शायद किसी और व्यवस्था ने नहीं किया होगा। तुम फलना जाति के हो, तुम चिलना जाति के हो, तुम ढिकना जाति के। इतनी जातियां है कि उतना किसी जाति वाले गिनती तक नहीं जानते होंगे शायद। उतना से भी पेट नहीं भरता। तुम उच्च जाति के हो, तुम मध्यम जाति के हो, तुम नीच जाति के हो? तुम ये पालते हो, तुम ये चराते हो, तुम ई सब खाते हो, तुम यह काम करते हो। आखिर भला अफ्रीका के जंगलों से उत्पन्न इंसानो में इतनी वर्ग-भेद कैसे हो सकती है? इसके पीछे जरूर कोई असामाजिक तत्वों के हाथ हो सकता है या वर्चस्ववादी वर्ग का हाथ हो सकता है। जो चाहता है कि लोग जातियों में बटे रहे और हम फुट डालकर मौज करते रहे। लेकिन वक्त का करवा बदल रहा है। फुट डालकर मौज करने वाले के दिन जाने वाले हैं। कई बार यह भी देखा गया है कि इंसान बहुत धार्मिक है फिर भी छोटे जाति-बड़े जाति की रट लगाए रहता है। आखिर ये सब सीख कहां से मिलता होगा। हर इंसान कोई न कोई भगवान, अल्लाह, परमात्मा, गुरु इत्यादि को मानता ही है तो किस भगवान, अल्लाह, परमात्मा इत्यादि ने सिखलाया की इंसान-इंसान में भेद करों? हाँ, कुछ अव्यवहारिक और काल्पनिक ग्रंथ या किताब है जिसमें असमानता का उल्लेख है जिसके बारे में डॉ आंबेडकर ने समय रहते सचेत किया था।
    अगर यह भेद जाति के आधार पर जारी रहती है तो ऐसी "जाति" की ऐसी की तैसी जरूर होनी चाहिए। मतलब खात्मा जरूर होनी चाहिए।



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06 May, 2019

रिश्ते, समाज और हम






      कहा जाता है कि रिश्ते और परिवार समाज की अहम डोर होते हैं । जब नये-नये रिश्ते जुड़ते है तो नये समाज का निर्माण होता है । आधुनिकता के इस दौर में भौतिकता के चक्कर में समाज निर्माण की कार्य-गति धीमी पड़ती जा रही है । नित्य नये रिश्ते तो जुड़ रहे हैं, लेकिन पुराने रिश्ते में धीरे-धीरे दरार पैदा हो रही है । भौतिक साधनों की प्राप्ति में हम इस कदर व्यस्त हो चुके हैं कि किसी के पास बातचित और मिलने-जुलने की फुर्सत नहीं । जबकि आज बातचित का सबसे आसान और सस्ता साधन सबके पास उपलब्ध है ।
      हमारे समाज में ऐसे कई मौके आते है जिसमें मिलने-जुलने का अवसर मिलता है जैसे- शादी-विवाह, बर्थ-डे पार्टी, मैरेज एनिवर्सरी, गृह-प्रवेश, मुंडन समारोह, मृतक-भोज कार्यक्रम तथा पर्व-त्योहार । यह वह वक्त होता है जिसमें आप अगर सरकारी कार्यालय में भी कार्यरत हो तो छुट्टी मिलने की गुजाईश रहती है ।
      अभी शादी-विवाह का मौसम चल रहा है । यह वह समय है जब एक-दूसरे रिश्तेदारों से भेट-मुलाकात हो सकता है । इस समारोह में जाने से नये दोस्त और नये रिश्तेदारों के साथ अपने पुराने दोस्त, पास-पड़ोसियों और रिश्तेदारों से मिलकर खोयो आत्मीय रिश्तों को रिचार्ज कर सकते हैं । रिश्तों में दरार का एक ही कारण हो सकता है- आपसी मन-मुटाव या अपने आप को बड़ा महसुस करना, जिसे अहम भाव पैदा हो जाना भी कह सकते हैं । जब दो रिश्तों के बीच जब अहम भाव पैदा हो जायेंगे या मन-मुटाव कायम रहता तो इन आत्मीय रिश्तों को कभी रिचार्ज नहीं कर पायेगे और इस डोर को जुड़ने का फिर से वर्षों इंतजार करना पड़ेगा ।
      रिश्तेदारों और पड़ोसियों में टकराव इस कदर हो रहा है कि छोटी-छोटी बातों पर मुंह मोड़ लिया जा रहा है । जिस किसी व्यक्ति का गाँव-घर उसके कार्यस्थल से एक-दो किलोमीटर दूर है वो पारिवारिक कलह की वजह से कार्य-स्थल का सफर पाँच-सात किलोमीटर दूर से जाना मुनासिब समझ रहा है, लेकिन पारिवारिक कलह को दूर करने का कोई प्रयास नहीं कर पा रहा है ।
      कई परिवार तो मुझे ऐसे मिले जो पास-पड़ोस और परिवार में बदले माहौल की वजह से अपने बच्चे और खुद गाँव-घर से दस-बीस किलोमीटर दूर रहते हैं । वहीं से घर आकर अपनी खेती-गृहस्थी की देखभाल करते और परिवार चलाते है । उनका कहना यहीं होता है कि गाँव-घर का माहौल बदला हुआ है । पहले जैसा माहौल अब नहीं रहा, जब एक-दूसरे से प्रेम पूर्वक मिलना जुलना होता था, एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते थे, आज यह प्रचलन लगभग खत्म हो रहा है ।
      आखिर रिश्ते, रिश्तेदार, गाँव-घर में बदले माहौल के लिए कौन जवाबदेह है ? उन्हें सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है ? कोई इसे सुधार करने के लिए आगे क्यों नहीं आ पा रहा है ? हमारे समाज में हर तरह की व्यवस्थायें मौजूद है, वो भी पहल क्यों नहीं कर पा रहा है ? हम कब तक इंतजार करेंगे, कही ऐसा न हो इंतजार करते-करते इतना देर हो जाए कि फिर इन्हें सुधरने की गुजाईश ही न हो । कहीं हमारे अकेले मस्त रहने की आदत हम पर ही भारी न पड़ने पड़ जाये ।


30 April, 2019

फिर चल दिये हम कहाँ, तुम कहाँ...


     


       



    इस धरती का वो नमुना व्यक्ति जिसे आज तक किसी लड़की से प्यार नहीं हुआ । जिसने प्यार शब्द के बारे में दूर-दूर तक सोचा भी नहीं था और जिसे प्यार शब्द से भी चिढ़ था । उसे गाँव से शहर आते ही आज से लगभग 15 वर्ष पहले एक अनजानी परी से मुलाकात हुई । देखते- देखते पल भर तो ठिठका, पर वो पहला प्यार, न जाने कब हो गया, पता नहीं, पहली नजर में अपना होश खो बैठा । वो चुलबुली, हँसती-खिलखिलाती अपने सहेलियों संग मस्तियों में मशगुल । मैं देहात के साधारण-सा लड़का, वो शहर की हसीन छोरी । अपने दिल की बात तो दूर, चंद बाते करने की हिम्मत नहीं पर उस दिन के बाद हर पल हर वक्त उसकी यादों में खोया रहता । उससे मिलना लगभग रोज हो ही जाता था । दिल की बात तो नहीं कह पाता, पर उसकी याद ख्वाबों में संजोये रहता । मै भी किसी न किसी बहाने जरूर मिल लेता । अब मेरा दिल हर बार उससे मिलने को बेताब रहता, जब वो नहीं आती तो घंटों इतजार करता ।
दुर्भाग्य से मेरा जॉब दूसरे शहर में हो गया । अब दिन-रात बेचैन । इधर-उधर, पार्क में घंटो बैठा, उसके साथ गुजरे पल को याद करता । इश्क की तड़पन और दिल की धड़कन बढ़ गई थी, होठ खामोश थे, पर इस कातिल का उम्मीद जिंदा था क्योंकि मैं उससे सच्चा प्यार करता था। अब ऑफिस से छुट्टी के बाद एस्कॉन टेम्पल जाकर राधा-कृष्ण की मूर्तियों को निहारता । आज मेरी राधा मुझसे जुदा थी, बाते बिल्कुल बंद थी । एक दिन एक अनजान कॉल ने फिर से दिल में खलबली पैदा कर दी, अब धीरे-धीरे दिल खुलकर बाते होने लगी । ऑफिस खत्म होते ही साढ़े पाँच बजे रोज उसका फोन आ जाता, वो भी मेरे ऑफिस खत्म होने का इंतजार करती । कभी-कभी तो लंच आवर में भी घंटो बात होती । मैं तो उसके लंच आवर लड़की और साढ़े-पाँच बजे वाली लड़की ही कहता । ऑफिस से निकलने में देर होते ही, मिस-क़ॉल की सुनामी आ जाती । फिर क्लास शुरू, कहाँ थे ? क्या कर रहे थे ? तरह-तरह की बाते... मजाक- मजाक में कभी-कभार उसे चिढ़ाने के लिए किसी और को भी अपनी जिंदगी में होने की बात करता, पर हो एक बहाना था । वो एक नायाब नमुना, मेरी जिंदगी में अकेली और अजुबा थी । एक बार तो ऐसा हुआ कि मैं ऑफिस के कार्य में ज्यादा व्यस्त था । उसने फोन की तो मैं गुस्से से झूझलाकर कहाँ- मुझे तुमसे बात नहीं करना, उसने भी कहाँ, ठीक है आज से बात नहीं करेंगे । दस मिनट बाद ही उसने रोते हुए कॉल किया, कहा- आज से हम गुस्सा नहीं करेंगे, आप जब कहियेगा तब ही कॉल करेगे । उस दिन मुझे पता चल गया कि कितना प्यार करती है वो मुझसे !
      वक्त में मोड़ आया, जब हम अपनी एक छोटी- सी गलती की वजह से अलग हो गये. जॉब का घमंड, भौतिकता के मद में चूर । दोषी खूद मैं । वो हर-बर मुझे अपनाने को तैयार मैं परिस्थितिवस ना-ना करता रहा । मैं डिसीजन लेने में चुक गया । आज दुसरी जीवन संगिनी आने के बाद भी उसकी यादों में खोया रहना, अपने को गलत डिसीजन के लिए कोसना, कभी-कभार सोचते-सोचते आंसु आ जाना । पर अब देर हो चुकी थी, वो किसी और की हो चुकी थी । आज जब ऑफिस में काम करता हूँ, मोबाईल चालू कर, यू-ट्यूब से उसी याद में दर्द भरे गाने सुनकर दिल बहलाता । जिंदगी की वो छोटी सी गलती मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी । आज भी मैं उससे संपर्क में तो हूँ पर मैं किसी की जिंदगी को बिखेरना नहीं चाहता,  किसी की खुशियाँ छिनना नहीं चाहता । आज मैं वाट्सएप्प पर रोज ऑनलाईन तो देखता हूँ, पर चंद बाते दिल की नहीं लिख सकता, क्यों ? क्योंकि अब वो किसी और की है । पर उसके वाट्सएप्प की बार-बार बदलते डीपी और स्टेट्स से संतोष करता हूँ । बस इंतजार है अगले जन्म का कि अगली बार ऐसी गलत डिसीजन  नहीं लूंगा, चाहे मुझे दुनिया से लोहा लेना पड़े । क्योंकि प्यार क्या होता है, वो बिछड़ने के बाद पता चलता है ? हम दोनों एक तो नहीं हो सके, पर राधा-कृष्ण की भाँति दोनों एक-दूसरे से प्रेम से जुड़े रहने की कसम खाई है । मैने तो अपने जीवन के लॉगिन का पासवर्ड बना लिया है तुम्हें, जिसे किसी को नहीं बताता पर यादों में हमेशा रहता हूँ  और एक वो है जो हमें भूल गयी । दो पल रूका ख्वाबों का कारवाँ और फिर चल दिये तुम कहाँ, हम कहाँ...