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02 May, 2020

कर्मचारी हूँ मजदूर बनने का इंतजार क्यों कर रहे हो।




दुखी हूँ महामारी से फिर भी बदहाल क्यों कर रहे हो।
कर्मचारी हूँ मजदूर बनने का इंतजार क्यों कर रहे हो।

सैलरी, डी.ए काटकर क्या मन नहीं भरा साहब।
कटे गले को हलाल करने का उपाय क्यों कर रहे हो।

एक से अधिक पेंशन लेकर कोई मौज कर रहा।
नेतृत्व घरानों पर इतना मेहरबान क्यों कर रहे हो।

महामारी की धुंध से छाई है मन में पहले से सन्नाटा।
दिल बहलाने के खातिर इतना कद्रदान क्यों बन रहे हो।

टूटे दिल की कश्ती बनाकर लड़ रहे योद्धाओं को।
अब फिर दिल टूटने का इंतजार क्यों कर रहे हो।

मत करों बेबस साहब की सड़क पर आ जाऊं।
जिंदगी में पहली बार ऐसा पालनहार क्यों बन रहे हो।
                                          -जेपी हंस

08 December, 2017

बन गई थी वो दोस्त मेरे...



बन गई थी वो दोस्त मेरे बाजार-ए-शाम खड़े-खड़े ।
निकल गई किसी और के संग, रह गए अरमां धरे-धरे ।
वो तो कटी पतंग थी, मैं तो ठहरा मांझा ।
आंसुओं का क्या रोकना, गम भी न कर सकता साझा ।
झर-झर आंसू बहा रहा हूँ, बिस्तर पर पड़े-पड़े ।
बन गई थी वो दोस्त मेरे बाजार-ए-शाम खड़े-खड़े ।
यो क्यों पूछते हो तुम, पल-पल में हाल मेरा ।
जिसका न कोई हमसफर है, कैसे कटेगी शाम-सबेरा ।
सफर के हमसफर लाने, फिर से फेक रहा हूँ डोरा ।
अपनी किस्मत रूठी रहे या हाथ में आये कटोरा ।
लेकर कटोरा पार्क में बेचूँगा चना-चबेने ।
बन गई थी वो दोस्त मेरे बाजार-ए-शाम खड़े-खड़े ।
                               जेपी हंस

11 May, 2017

सपने थे हजार (गजल)



सपने थे हजार उनके मन में,
पर कोई उजाला ला न सका ।
भटकता रहा दर-दर पगडंडियों पे,
पर कोई सामने आ न सका।
हजार रास्ते बनाये रहमो-करम ने,
पर कोई रास्ता पहुँचा न सका ।
ढोता रहा सपनों का बोझ,
पर कोई उसे उठा न सका ।
सहता रहा हजार जुल्मों-सितम,
पर कोई कहर का जवाब दे न सका ।
सपने थे हजार उनके मन में,
पर कोई उजाला ला न सका ।
               -जेपी हंस

काश तु मिलती (गजल)





काश तु मिलती तो एक दिन ।
आखें फड़फड़ाके कहती है ।
दो जिस्म एक जान होती ।
धड़कने  पुकार कर कहती है ।
झुठ नहीं बोलती वो नयन ।
जो गिड़गिड़ा के कहती है ।
जग जाहिर ही होते है वो ।
सपने जिनके कामयाब होती है ।
आँखों के आसुँ से भर गये गागर ।
गागर की लहरे उफान भरके कहती है ।
काश तु मिलती तो एक दिन ।
आखें फड़फड़ाके कहती है ।