17 May, 2021
शुक्र कर रब का
05 December, 2020
किसानी क्रांति
हम किसानों के लिये सोचते है,
क्यों?
क्योंकि हम किसान के बेटे है।
क्योंकि हम किसानों के खेत में उपजाया हुआ
अन्न खाकर जिंदा है।
हम किसानों के खेत में उपजाया हुआ अन्न की रोटियां तोड़ते हैं।
हमारी सोच भी किसानों के खेतों की भांति उपजाऊ है।
वे लोग ही सोचते हैं, किसानों के खिलाफ,
जो कारपोरेट के पैसे से रोटियां तोड़ते हैं,
जो बालकोनी में दो-चार पौधे उपजा किसान बन रहे हैं,
जिन्हें सत्ता से किसानों के खिलाफ लिखने से रोटियां चलती है,
जो सत्ता के अदम्य चापलूसी करते नहीं अघाते,
जो सत्ता के अंधभक्ति में आकंठ डूबे है।
उन्हें क्या पता आंदोलन व क्रांति क्या चीज होती है?
आखिर पता भी कैसे चलेगा,
सत्ता के मद में चूर रहने वालों को,
सीसे के महलों में रहने वालों को,
बाहरी दुनिया की आवाज कैसे पहुँच सकती है?
जब तक की,
सड़के वीरान हो,
खामोश हो,
सड़को पर क्रांति और आंदोलन की गूंज सुनाई न दी हो।
-जेपी हंस
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25 November, 2020
भारतीय समाज और संविधान
सिंधु घाटी सभ्यता से उपजी भारतीय समाज आर्यों, कुषाण, हुन, अफगान, तुर्क, खिलजी, लोधी, मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक के विदेशी आक्रमण, गुलामी और शोषण का दंश पाँच हजार सालों तक झेलते हुए 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ और इस आजाद भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ साथ ही पाँच हजार साल तक चले सारे मनुवादी विधान को शुन्य घोषित कर दिया.
भारतीय
संविधान को निर्माण करने वाले और कोई नहीं वह व्यक्ति था जिसके समाज को मनुवादी
विधान से पाँच हजार सालों से मानसिक रूप से गुलाम बनाकर रखा गया था वो वह वर्ग था
जिसका मनुवादी विधान से एक मात्र कार्य दिया गया था मैले का गट्टर साफ करना/मैला
साफ करना/मरे हुए पशुओं को उठाना. उन्हें पाँच हजार सालों तक अछूत बनाकर रखा गया
था, वो वह वर्ग से था जिसको भारत के धार्मिक ग्रन्थों में शुद्र का दर्जा दिया गया
है, जिसकी उत्पति पैर से मानी गई है, जिन्हें शिक्षा, शस्त्र और सम्पति हासिल करने
का कोई अधिकार नहीं था लेकिन उस व्यक्ति ने सारे मनुवादी बेड़ियों को तोड़ते हुए
32 डिग्रियाँ हासिल कर ऐसा विधान रच डाला जहाँ सभी वर्गों के लोगों को समानता का
अधिकार हो. न कोई राजा होगा और न ही कोई रंग. वह व्यक्ति था विश्व रत्न बाबा साहेब
डॉ भीमराव अम्बेडकर. इन्होंने लगातार 2 वर्ष 18 दिन तक संविधान निर्माण के लिये
कार्य किया और अंततः 26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा को संविधान निर्माण कर सौप
दिया ।
भारतीय संविधान के 70 साल- भारतीय संविधान लागु हुए 70 साल हो गए है लेकिन मनुवादी मानसिकता वालों के दिलों पर अभी भी मनुवादी विधान की रट लगी हुई है. वे धर्मरूप अफीम का नशा चखाकर फिर से मानसिक गुलामी की दलदल में धकेलना चाहते हैं. भारतीय समाज विश्व का एक मात्र ऐसा समाज था जो जानवर के मुत्र तो पी सकता था लेकिन इंसानों के हाथ का पानी नहीं पी सकता था, आज भी कही-कही इस तरह की भावना है. भारतीय संविधान बनने से छुआछूत, भेदभाव, बेगारी प्रथा, देवदासी प्रथा, खाप की प्रथा जैसे अनेक धार्मिक कुप्रथाओं पर लगाम लगा हैं. आजादी के बाद भी कही-कही यह स्थिति थी कि जैसे वर्ग विशेष के लोगों के सामने जाने के लिए जुता/चप्पल उतार कर जाना पड़ता था. उनके घर जाने पर साथ में बैठने नहीं दिया जाता था. अपने घर पर भी ऐसे वर्ग विशेष के लोगों के आने पर खाट, कुर्सी छोड़कर उनके सामने गुलामों की तरह हाथ जोड़कर खड़े होना पड़ता था. वर्ग विशेष लोगों के छोटे बच्चों को भी “मालिक” कहकर पुकारना पड़ता था. वर्ग विशेष के लोगों को “बाबू साहब” जैसे गुलामी मानसिकता वाले शब्द कहकर पुकारना पड़ता था. वर्ग विशेष के सुदखोरों के सामने अपनी जमीन जायदाद, गहना जेवर या खुद के परिवार के सदस्यों को गिरवी रखकर पैसा लेना पड़ता था. यहाँ तक की चापाकल से पानी पीने के लिए और शादी में घोड़-सवारी के लिए भी कोर्ट की लड़ाई लड़नी पड़ी है.
आज
देश में फिर से मनुवादी तंत्र हावी है और येनकेनप्रकारेन भारतीय संविधान को कमजोर
करने में लगे है. उन्हें अपनी धर्म की तो फिक्र है लेकिन किसी इंसान के लिए
रोजी-रोटी, मकान और शिक्षा की फिक्र नहीं है. उन्हें दलितों, शोषितों और पीड़ितों
की हक की कोई चिंता नहीं है, सभी लोगों को स्वतंत्र रूप से तार्किक शिक्षा की
जरूरत है. डॉ भीमराव अम्बेडकर ने कहाँ था- शिक्षित हो, संगठित हो और संघर्ष करों.
इसी मूल मंत्र के सहारे संविधान को मनुवादियों के बलि चढ़ने के बचा सकते हैं.
जय
भारत, जय संविधान
23 September, 2020
बिहार की नई शारदा सिन्हा- नेहा सिंह राठौड़
भोजपुरी महफिल का इतिहासः-
भोजपुरी जगत हमेशा से ही समृद्ध लोक गीतों
की महफिल रही है. यह महफिल की शुरुआत भिखारी ठाकुर से शुरू होकर अनगिनत कलाकारों
के नाम सजाती हुई आगे बढ़ती है. भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी संस्कृति व साहित्य को एक नई पहचान
देन के साथ समाज में फैली कुरीतियों पर जमकर हल्ला बोला। विदेशिया, गबर-घिचोर
के साथ-साथ बेटी-वियोग और बेटी बेंचवा जैसे नाटकों के जरिये उन्होंने समाज में एक
नई चेतना फैलाई। बाल-विवाह, मजदूरी
के लिए पलायन और नशाखोरी जैसे मामलों पर उन्होने उस समय सवाल खड़े किए जब कोई इसके
ओर सोचना तो दूर बोलने को भी तैयार नही था।
इन्हीं कड़ी में 80 के दशक के मशहुर
लोक गीत गायिका शारदा सिन्हा ने भी भोजपुरी, मगही और मैथिली में पारम्परिक लोकगीत
के ऐसा नाम रोशन किया कि शादी-विवाह, छठ पूजा और अन्य धार्मिक पूजन में इनके गीत आज
भी गाये जाते हैं.
बिहार की नई शारदा सिन्हा- नेहा सिंह
राठौड़
इन
लोक कलाकारों का क्रम लगातार जारी है. इन्हीं नामों में एक चर्चित नाम जुड़ा है-
नेहा सिंह राठौर, नेहा सिंह राठौर का जन्म बिहार के भभुआ (कैमुर) के रामगढ़ में
जलदहा गाँव में हुआ था. इनके पिता जी का नाम श्री रमेश सिंह है. इनकी प्रारम्भिक
पढ़ाई अपने जिला में हुआ तत्पश्चात उच्च शिक्षा के लिए कानपुर की ओर प्रस्थान किया
जहाँ वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेज्युशन पास किया. वर्तमान में कोलकाता में
रहकर संगीत की शिक्षा ले रही है. नेहा ने अपना पहला गीत शारदा सिन्हा की लोकगीत को
गाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, जिसके बदौलत आज सोशल मीडिया पर स्टार बन चुकी
हैं. इसके बोल है-
पटना से बैदा बुलाई दा नजारा गईनी
गुईया.
छोटकी ननदिया है, बड़की सौतनिया....
इसी लोकगीत के बाद नेहा सिंह राठौर ने कोरोना, अप्रवासी मजदूर, बेरोजगारी, दहेज प्रथा, बाल विवाह, मतदान जागरूकता, चुनावी गीत, बाढ़, छात्रों का दर्द किसान का दर्द और अन्य समसमायिक घटनाओं पर लोकगीत के माध्यम से अपनी आवाज उठा रही है. जिससे सोशल मीडिया पर इनके प्रशंसक बढ़कर करीब तीन मिलियन हो गए हैं. इनके कुछ गीतों को दो मिलियन से ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं. जो इस बात का प्रमाण है कि भोजपुरी गीतों की अश्लीलता भोजपुरी गीत-गायन परंपरा का स्वाभाविक गुण न होकर एक थोपा हुआ कल्चर है.
भोजपुरी गीतों में अश्लीलता की बाते
गाहे-बेगाहे हर मंच से होती है. इस संबंध में बहुत सारे कलाकारों पर निशाने साधे
जाते हैं. भोजपुरी गीत और कलाकारों के संबंध में The Lallantop लिखता है-
यहाँ यह समझने
की बात है कि लोक-कला वो नहीं है जो लोक की आड़ में अपनी रोटियां सेंकी जाए और लोक
की संस्कृति विकृत हो, बल्कि लोककला तो वो है, जो लोक के पक्ष को कला के माध्यम से
फलक तक ले जाए और लोक की छवि को बेहतर बनाते हुए उसे समृद्ध करे. ऐसे में जो
व्यक्ति अपनी कला की माध्यम से ये करने का बीड़ा उठाता है, वही असली लोक-कलाकार
है.
आज नेहा सिंह राठौर भोजपुरी लोकगीत को बदनामी
की दाग को मिटाने आ गई है..यह लोकगीतों के माध्यम से लोक की आवाज को आवाम तक बखुबी
से पहुँच रहा है और लोक संगीत की साफ-सुथरी छवि को और समृद्ध करने का कार्य कर रही
है. इनका भाषा भोजपुरी, मगही और मैथिली है.
कोरोना महामारी के कारण जब लॉकडाउन हुआ
और मजदूरों का एक शहर से दूसरे शहर हजारों किलोमीटर पैदल जाना हुआ तो नेहा सिंह
गाती है...
“कोरोना महामारी के चलते मजदूर शहर से पैदले आपन गाँव चल
दिहल बाडन...
उनकर शरीर थक
गईल बा चलत-चलत आ मन रोवत बा...”
17 सिंतबर को जब पीएम मोदी का जन्मदिन था उस दिन देश में कई जगह राष्ट्रीय बेरोजगारी दिवस के रूप में मनाया गया।
इस क्रम में नेहा सिंह राठौर ने भी भोजपुरी में एक गीत
गाकर बेरोजगारी के मुद्दे को उठाया। इस दौरान नेहा ने कुछ समय अंतराल पर अलग-अलग
वीडियो पोस्ट किया। इसमें वह देश में बेरोजगारी की समस्या को उठाती दिखीं।
‘अच्छा दिन आई गईले हो…’,
‘हाय-हाय रे गवर्नमेंट तोहार काम देख ला,
बबुआ घूमेलन नाकाम देख ला…’
और ‘ बेरोजगारी के आलम में थरिया पीटत बानी, बिहार से बेरोजगार बोलत बानी…’ जैसे शीर्षक के गाने गाए।
मोदी
सरकार ने तमाम विरोध के बावजूद कृषि बिल को संसद में पारित करवा लिया तो नेहा सिंह
लिखती है- मैंने हमेशा कहानियों में यही पढ़ा है कि एक गरीब किसान था. जाने वो दिन
कब आएगा जब कहानियों में एक अमीर किसान था जैसी बातें लिखी जाएंगी.
किसान
पर इनके नए भोजपुरी गीत के बोल है-
भादो
आषाढ़ जाहे जेठ के घाम, केहूं बुझे न कोहीं,
01 August, 2020
फ्रैंडशिप डे FRIENDSHIP DAY एक नजर में...
दोस्ती परिचय-
जब हम जन्म लेते हैं तब से ही किसी न किसी रिश्तों की बागडोर में बंधे चले आते
हैं या हम यों कहे कि हम परिवार में विभिन्न रिश्तों की डोर से बंधे होते हैं
लेकिन पारिवारिक रिश्तों के अलावा एक और महत्वपूर्ण रिश्ता हमारे जीवन में काफी
महत्व रखता हैं और वो रिश्ता होता है दोस्ती अथवा मित्र का रिश्ता, जो विश्वास व
सहयोग के आधार पर टिका होता है, जो हर सुख-दुख के साथी होता है... ये सभी रिश्ते
हमारे समाज में सरोकार बनाये रखने के लिए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है...
मित्र,
सखा, दोस्त, फ्रेंड, चाहे किसी भी नाम से पुकारा जाए, दोस्त की कोई एक परिभाषा हो
ही नहीं सकती... इंसान के दो प्रकार के दोस्त होते हैं... पहला वह जो बचपन से
दोस्त होता है, जिसके साथ वो बड़ा होता है और दूसरे प्रकार की दोस्ती वह होती है
जो इंसान को जन्म के बाद में होती है, मतलब स्कूल लाईफ, कॉलेज लाईफ में या
प्रोफेशनल लाईफ में हमें दोस्त मिलते हैं...
कुछ ऐसे भी दोस्त मिल जाते हैं जो कुछ समय
के लिए साथ निभाते हैं और कुछ ऐसे भी दोस्त मिलते हैं जो सारी जिंदगी हमारा साथ
निभाते हैं चाहे सुख हो या दुख वो हमारा कभी साथ नहीं छोड़ते... दोस्ती के बारे
में योहि नहीं कहा गया है कि जिसके जीवन में सच्चा दोस्त नहीं है, उनके जीवन
में सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है...
मोबाइल में रम्मी कैसे खेलते हैं उसकी जानकारी
दोस्ती क्यो?
सभी तरह के बंधन एवं संकीर्णताओं को तोड़कर
आपस में प्रेम, सम्मान और परस्पर सौहार्द बढ़ाने का संदेश देने वाले इस अनूठे
त्योहार की प्रासंगिकता आधुनिक समय में बढ़ती जा रही है, क्योंकि आज मानवीय
संवेदनाओं एवं आपसी रिश्तों की जमीन सूखती जा रही है, साथ ही रोजी-रोजगार के
भागम-भाग में घर से सैकड़ो किलोमीटर दूर, जहाँ अपने रिश्ते वाले नहीं होते हैं ।
ऐसे समय मे एक दूसरे से जुड़े रह कर जीवन को खुशहाल बनाना और दिल के जादुई
संवेदनाओं को जगाने का रिश्ता दोस्ती ही करती आ रही है...
दोस्ती खून का रिश्ता तो नहीं होती है लेकिन
उससे भी बढ़कर होती है... दोस्ती एक ऐसी चीज होती है जो हमारे हर अच्छे-बुरे काम
में हमारे साथ होती है और हम अपनी पर्सनल बातें हर किसी के सामने शेयर नहीं सकते
लेकिन दोस्त को हम बेझिझक अपने दिल की हर बात बता देते हैं और वह हर बार हमारी हर
बात पर हमारे साथ खड़ा होता है... वास्तव में मित्र उसे ही कहा जाता है, जिसके मन
में स्नेह की रसधार हो, स्वार्थ की जगह परमार्थ की भावना हो...ऐसे मित्र संसार में
बहुत दुर्लभ है.. जैसे कृष्ण और सुदामा और
राम और हनुमान...
“दोस्ती का मतलब एक प्यारा सा दिल,
जो कभी नफरत नहीं करता..
एक प्यारी मुस्कान, जो फीकी नहीं पड़ती,
एक एहसास जो कभी दुख नहीं देता,
और एक रिश्ता जो कभी खत्म नहीं होता..”
मोबाइल ऐप के साथ मुफ्त में रम्मी कैसे खेलें?
दोस्ती दिवस की शुरुआत:
मित्रता दिवस या दोस्ती दिवस या इसे
फ्रैंडशिप डे कहे, यह दो अनजान लोगों के पहचान को बताती है... यह अगस्त माह के
पहले रविवार को मनाया जाता है... सर्वप्रथम मित्रता दिवस 20 जुलाई, 1958 ई में
पराग्व में डॉ रमन आर्टिमियों द्वारा प्रस्तावित किया गया था.. दोस्ती के बारे में कहा
जाता है कि इंसान अपने परिवार, रिश्तेदारों को नहीं चुन सकता लेकिन वो अपने लिए
दोस्त चुन सकता है...
दुनिया के अलग-अलग देशों में इसे अलग-अलग
दिन मनाया जाता है... 27 अप्रैल 2011 को संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में 30
जुलाई को आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस के रूप में घोषित किया गया जबकि
भारत समेत अन्य देशों में इसे अगस्त के पहले रविवार को मनाया जाता है...
जिंदगी के बाकी सभी रिश्तों के साथ हम पैदा
होते हैं पर दोस्ती ही एक मात्र रिश्ता है जिसे हम खुद बनाते हैं.. यह वह रिश्ता
है जो एक दूसरे की मदद के लिए वक्त-बेवक्त हाजिर रहते हैं और जिंदगी की तमाम
मुश्किलों से लड़ने की ताकत और हिम्मत हमें देते हैं..
एक सर्व प्रचलित
बाते हैं-
“दोस्ती कोई खोज नहीं होता,
दोस्ती किसी से हर रोज नहीं होती,
जिदंगी में मौजूदगी उनकी बेवजह नहीं होती,
क्योंकि पलकें आंखों पर कभी बोझ नहीं होती.”
1.
हमारी सबसे बेहतरीन किताब 100 दोस्तों के बराबर होती हैं लेकिन एक बढ़िया दोस्त एक लाइब्रेरी के बराबर होता है- डॉ अब्दुल कलाम
2.
दोस्ती एक बेहतर ही सुखद
जिम्मेदारी है, अवसर नहीं- खलील जिब्रान
3.
जीवन का सबसे बड़ा उपहार
दोस्ती है और यह मुझे सौभाग्य से मिलता है- ह्यावर्ट हम्फ्री
4.
सच्चा दोस्त वहीं होता है
जो तब हमारा साथ देता है जब सब साथ छोड़ देते हैं.
5.
मूर्ख मित्र से बुद्धिमान
शत्रु हर स्थिति में अच्छा होता है.
6.
ज्ञानवान मित्र ही जीवन का
सबसे बड़ा वरदान है.
7.
मित्र वे दुर्लभ लोग होतें
हैं, जो हमारा हालचाल पूछते हैं और उतर सुनने को रूकते भी है.
8.
सच्चा मित्र वह है जो दर्पण
की तरह तुम्हारें दोषोंको तुम्हें दिखाए, जो तुम्हारें अवगुणों को गुण बताए वह तो
खुशामदी है.
9.
तुम्हारा अपना व्यवहार ही
शत्रु अथवा मित्र बनाने के लिए उत्तरदायी है.
10.
अपने मित्र को एकात में
नसीहत दो, लेकिन प्रशंसा खुलेआम करों.
11.
मित्रता करने में धैर्य से काम लो, किंतु जब
मित्रता कर ही लो तो उसे अचल और दृढ़ होकर निभाओ.
12.
दोस्त वो होते हैं, जो हर
समय अपने दोस्त का साथ निभाते है, चाहे दोस्त किसी भी परिस्थिति में हो..
13.
आप भले ही दुनिया की सारी
दौलत लगा लो आप सच्ची दोस्ती नहीं खरीद सकते.. पर जिसके पास सच्चा दोस्त है, वो
दुनिया का सबसे अमीर इंसान है.
14.
विदेश में विद्या मित्र
होता है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगी का मित्र औषधि और मृतक का मित्र धर्म
होता है.
15.
सच्चे मित्र हीरे की तरह
कीमती और दूर्लभ होतें है, झूठे मित्र पतझड़ की पत्तियों की तरह हर कही मिल जाते
हैं.
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