Showing posts with label शववाहिनी गंगा. Show all posts
Showing posts with label शववाहिनी गंगा. Show all posts

19 May, 2021

शववाहिनी गंगा

शववाहिनी गंगा

           गुजराती-कवयित्री पारुल खख्खर द्वारा रचित यह गीत दरअसल मौजूदा कोरोना-काल के दौरान गंगा में बहायी जा रही बेशुमार लाशों एवं दफनाये गये लाशों  को देखकर वर्तमान सरकार की नाकामियों को नंगा करता है.

 



 



एक-साथ सब मुर्दे बोले,

सब कुछ चंगा-चंगा

साब, तुम्हारे रामराज में

शववाहिनी गंगा ।

 

खत्म हुए श्मशान तुम्हारे,

खत्म काष्ठ की बोरी,

थके हमारे कंधे सारे

आंखे रह गयी कोरी;


दर-दर जाकर यमदूत खेले

मौत का नाच बेढंगा ।

साब, तुम्हारे राजराज में

शववाहिनी गंगा ।


नित्य निरंतर जलती चिताएं

राहत मांगे पल-भर;

नित्य निरंतर टूटती चूडियां,

कुटती छाती घर-घर;


देख लपटों को फिडल बजाते

वाह रे बिल्ला- रंगा 

साब, तुम्हारे राजराज में

शववाहिनी गंगा ।


साब, तुम्हारे दिव्य वस्त्र,

दिव्यत तुम्हारी ज्योति

काश, असलित लोग समझते,

हो तुम पत्थर, न मोती,


हो हिम्मत तो आके बोलो

मेरा साहब नंगा

साब, तुम्हारे रामराज में

शववाहिनी गंगा ।


                       लेखिका- पारुल खख्खर (गुजराती)

                       (गुंजराती से अनुवाद- इलियास शेख)

 



                                                         (पारुल खख्खर की विशेष परिचय अगले ब्लॉग में...)

     फोटो क्रेडिटः  संभार गूगल

[जेपी डायरी एक स्वतंत्र ब्लॉग है, इसे नियमित पढ़ने  के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. जेपी डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक, फेसबुक पेज, ट्विटर पर फॉलो करे]