खग-मृग छोड़ मनुज तन मिला
फिर भी लाखों है शिकवे गिला
गिले-शिकवे भूलाने को
तन-मन में सपने बुनो
वक्त की पुकार सुनो, वक्त की पुकार
सुनो
सपने
साकार करने में तुम्हे
लख-लख
कष्ट सहने पड़े
कर्मवीर
सेना की भाँति
अग्नि
की मशाल बनो
वक्त
की पुकार सुनो, वक्त की पुकार सुनो
कर्म-पथ दुर्गम है
वक्त भी न तेरे संगम है
समय समहित करने को
कंटिल पथ तुम सुगम मानो
वक्त की पुकार सुनो, वक्त की पुकार
सुनो
कंटिल
पथ पर न लौटे अनन्तर
सब
होगा एक दिन छू-मंतर
छू-मंतर
करने में चाहे
आसमान
टुटे, पहाड़ टुटे
अन्तर्मन
की पहचान करो
वक्त
की पुकार सुनो, वक्त की पुकार सुनो
जे.पी. हंस
जे.पी. हंस