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18 June, 2021

"जाती" और "जाति" की 'ऐसी की तैसी'




हमारे हेडिंग से ही आपको लग रहा होगा कि हम "जाती" और "जाति" की ऐसी की तैसी करने वाले है। मेरे शब्दों में "जाती" का मतलब 'जाती हुई लड़कीं' मतलब बेवफा लड़कीं। वह लड़कीं जो दिलरुबा लड़को का दिल तोड़कर किसी और के साथ रफूचक्कर हो गयी। इधर लड़का उसके प्यार में पागल बेवड़े बनकर घूम रहे हो, सिगरेट की कश पर कश लगाए जा रहा हो, शराब की बोतलों की हाउस सेलिंग-सी दुकान खोल रखा हो, एग्जाम में क्रॉस पर क्रॉस लग रहे हो। उधर बेवफा सनम अपने नए आशिक के साथ घोड़े बेचकर चैन की नींद सो रहा हो, उसे रति-भर भी फिक्र नहीं हो कि हमने सालों तक जिसके साथ इश्क फरमाया ओ कैसे हालातों में जिंदगी गुजार रहा हो? वैसे कहा जाता है कि प्यार में धोखा खाये इंसान दोबारा जिंदगी शुरू कर सकता है, लेकिन उसको कोई सीख देने वाला तो मिले। हालांकि जब प्यार में धोखा खाया इंसान दुबारा जिंदगी शुरू कर दे तो बेवफा सनम की शामत आना तय है। दिलरुबा बाबू साहब बिना खबर लिए छोड़ नहीं सकता। आखिर खबर भी क्यों न ले? प्यार करने में कितने पापड़ बेले और धोखा खाने का इल्जाम भी अक्सर उन्हें ही झेलने पड़ते हैं। लव और धोखा का इल्जाम भी गोली से निकले खोखे की तरह होता है। जो न घर का होता है न घाट का। जिस तरह से गोली से निकलने के बाद खोखे का महत्व नहीं रहता उसी तरह प्यार में धोखा खाये इंसान का जिंदगी जीने का  कोई मकसद नहीं रह जाता। वह अक्सर यही सोचता था कि जिसको से वह प्यार कर रहा था उसके साथ जिंदगी- भर रिश्ते निभाएगा।  एक तरफा प्यार में पागल होना सनकी कहलाता है। प्यार का खम्बा दोनों तरफ से मजबूत होनी चाहिए।

दूसरा शब्द है "जाति". मतलब यों कहें कि भारत एक कृषि प्रधान देश होने के साथ-साथ एक 'जाति' प्रधान देश है। वैसे कोई किसी से प्रधान हो क्या फर्क पड़ता है? जब तक वह व्यवस्था दूसरों का अहित न करें। भारत के इतिहास में आज तक जितना "जाति व्यवस्था" ने भारतीय समाज को अहित किया है उतना शायद किसी और व्यवस्था ने नहीं किया होगा। तुम फलना जाति के हो, तुम चिलना जाति के हो, तुम ढिकना जाति के। इतनी जातियां है कि उतना किसी जाति वाले गिनती तक नहीं जानते होंगे शायद। उतना से भी पेट नहीं भरता। तुम उच्च जाति के हो, तुम मध्यम जाति के हो, तुम नीच जाति के हो? तुम ये पालते हो, तुम ये चराते हो, तुम ई सब खाते हो, तुम यह काम करते हो। आखिर भला अफ्रीका के जंगलों से उत्पन्न इंसानो में इतनी वर्ग-भेद कैसे हो सकती है? इसके पीछे जरूर कोई असामाजिक तत्वों के हाथ हो सकता है या वर्चस्ववादी वर्ग का हाथ हो सकता है। जो चाहता है कि लोग जातियों में बटे रहे और हम फुट डालकर मौज करते रहे। लेकिन वक्त का करवा बदल रहा है। फुट डालकर मौज करने वाले के दिन जाने वाले हैं। कई बार यह भी देखा गया है कि इंसान बहुत धार्मिक है फिर भी छोटे जाति-बड़े जाति की रट लगाए रहता है। आखिर ये सब सीख कहां से मिलता होगा। हर इंसान कोई न कोई भगवान, अल्लाह, परमात्मा, गुरु इत्यादि को मानता ही है तो किस भगवान, अल्लाह, परमात्मा इत्यादि ने सिखलाया की इंसान-इंसान में भेद करों? हाँ, कुछ अव्यवहारिक और काल्पनिक ग्रंथ या किताब है जिसमें असमानता का उल्लेख है जिसके बारे में डॉ आंबेडकर ने समय रहते सचेत किया था।
    अगर यह भेद जाति के आधार पर जारी रहती है तो ऐसी "जाति" की ऐसी की तैसी जरूर होनी चाहिए। मतलब खात्मा जरूर होनी चाहिए।



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19 May, 2021

पारुल खख्खर - शववाहिनी गंगा की कवयित्री







पारुल खख्खर एक गुजराती लेखिका है । वह न लिबरल है, न वामी, न ही वह विरोध, प्रतिरोध, असहमति की कवि भी कभी रही । असल में तो वे हिन्दुत्वी जमात की लाडली रही हैं । आर.एस.एस के गुजरात मुखपत्र से जुडे राजनीतिक इतिहासकारमोदी द्वारा पदमश्री से सम्मानित विष्णु पांड्या पारुल को गुजराती काव्य साहित्य की आगामी नायिका तक बता चुके थें ।

      कोरोना महामारी के इस दौर में जहाँ सरकार द्वारा मरीजों को समय पर ऑक्सीजन न मिलना, हॉस्पिटल में बेड न मिलना, जब हाउसफुल श्मशानों और लकड़ियों के घोर अभाव के चलते उन्हे गंगा में खुले बहा देना, हाथ-भर जमीन में गड्ढा खोदकर जैसे-तैसे दफनाने और गंगा जैसी पावन नदियों में लाश बहाने पर लोग मजबूर हो रहे हैं ।  महामारी के इस दौर में इस महान विभीषिका को सरकार और नेताओं द्वारा प्रायोजित बता रहे हैं, वहीं न्यायपालिका तक इसे सरकारी नरसंहारकरार देती है. ऐसे में गुजराती कवयित्री की शववाहिनी गंगाकविता मौजूदा कोरोना काल में लाशों को गंगा में दफनाने व बहाने की सरकारी नाकामी को उजागर करती है ।

      संघी आई.टी. सेल को रामराज में मेरा साहब नंगा और रंगा-बिल्ला की उपमा कुछ ज्यादा ही मिर्ची लगने लगी है और ये सब ठीक उसी भाषा में उसी निर्लज्जता के साथ इन कवयित्री के पीछे पड़ गए हैं जैसे वे जेएनयू और जामिया की लड़कियों के पीछे पड़ते हैं । सिर्फ 14 पंक्तियों की इस कविता के लिए मात्र 48 घंटों में 28 हजार गालियां- अपशब्दों से भरी टिप्पणी हासिल की है । इसका कसूर सिर्फ इतना है कि गंगा में बहती लाशों को देखकर वे विचलित हो गई और सरकारी नाकामियों को उजागर करती कविता लिख डाली । इस कविता को असमी, हिन्दी, तमिल, मलयालम, भोजपुरी, अंग्रेजी, बंगाली भाषाओं में अनुवाद हो गया ।


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