हमारे
समाज में ऐसे कई मौके आते है जिसमें मिलने-जुलने का अवसर मिलता है जैसे-
शादी-विवाह, बर्थ-डे पार्टी, मैरेज एनिवर्सरी, गृह-प्रवेश, मुंडन समारोह, मृतक-भोज
कार्यक्रम तथा पर्व-त्योहार । यह वह वक्त होता है जिसमें आप अगर सरकारी कार्यालय
में भी कार्यरत हो तो छुट्टी मिलने की गुजाईश रहती है ।
अभी
शादी-विवाह का मौसम चल रहा है । यह वह समय है जब एक-दूसरे रिश्तेदारों से भेट-मुलाकात
हो सकता है । इस समारोह में जाने से नये दोस्त और नये रिश्तेदारों के साथ अपने
पुराने दोस्त, पास-पड़ोसियों और रिश्तेदारों से मिलकर खोयो आत्मीय रिश्तों को
रिचार्ज कर सकते हैं । रिश्तों में दरार का एक ही कारण हो सकता है- आपसी मन-मुटाव
या अपने आप को बड़ा महसुस करना, जिसे अहम भाव पैदा हो जाना भी कह सकते हैं । जब दो
रिश्तों के बीच जब अहम भाव पैदा हो जायेंगे या मन-मुटाव कायम रहता तो इन आत्मीय
रिश्तों को कभी रिचार्ज नहीं कर पायेगे और इस डोर को जुड़ने का फिर से वर्षों इंतजार
करना पड़ेगा ।
रिश्तेदारों
और पड़ोसियों में टकराव इस कदर हो रहा है कि छोटी-छोटी बातों पर मुंह मोड़ लिया जा
रहा है । जिस किसी व्यक्ति का गाँव-घर उसके कार्यस्थल से एक-दो किलोमीटर दूर है वो
पारिवारिक कलह की वजह से कार्य-स्थल का सफर पाँच-सात किलोमीटर दूर से जाना मुनासिब
समझ रहा है, लेकिन पारिवारिक कलह को दूर करने का कोई प्रयास नहीं कर पा रहा है ।
कई
परिवार तो मुझे ऐसे मिले जो पास-पड़ोस और परिवार में बदले माहौल की वजह से अपने
बच्चे और खुद गाँव-घर से दस-बीस किलोमीटर दूर रहते हैं । वहीं से घर आकर अपनी
खेती-गृहस्थी की देखभाल करते और परिवार चलाते है । उनका कहना यहीं होता है कि
गाँव-घर का माहौल बदला हुआ है । पहले जैसा माहौल अब नहीं रहा, जब एक-दूसरे से
प्रेम पूर्वक मिलना जुलना होता था, एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते थे, आज यह
प्रचलन लगभग खत्म हो रहा है ।
आखिर
रिश्ते, रिश्तेदार, गाँव-घर में बदले माहौल के लिए कौन जवाबदेह है ? उन्हें सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है ? कोई इसे सुधार करने के लिए आगे क्यों नहीं आ पा
रहा है ? हमारे समाज में हर तरह की व्यवस्थायें मौजूद है,
वो भी पहल क्यों नहीं कर पा रहा है ? हम कब तक इंतजार
करेंगे, कही ऐसा न हो इंतजार करते-करते इतना देर हो जाए कि फिर इन्हें सुधरने की
गुजाईश ही न हो । कहीं हमारे अकेले मस्त रहने की आदत हम पर ही भारी न पड़ने पड़
जाये ।