क्यों
ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध
इंसान पर ।
माता-पिता
ने उनको,
प्यार-दुलार
से पाला-पोसा ।
कितनी
भी की गलती उसने,
फिर
भी ऐसा नहीं कोसा ।
इतनी
कठोर न होता,
दिल-ए-पाषाण
को ।
क्यों
ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध
इंसान पर ।
कोमल-सी
थी बदन उनके ।
कमल-सी
थी नयन उनके ।
वाणी
थे जैसे मिठे रस ।
मिठे
रस को न पिलाकर,
क्यों
छोड़ दिया उस नौजवान को ।
क्यों
ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध
इंसान पर ।
सीख
रहे थे पाठ वे,
प्रेम,
शांति और भाईचारे के ।
तोड़ना
था तारे उनको,
पहुँचना
था चाँद पे ।
ऐसे
सपने को तोड़कर,
ला
दिया क्यों शमशान पे ।
क्यों
ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध
इंसान पर ।
जे.पी.हंस
जे.पी.हंस