डिग्रियां टंगी दीवार सहारे,
मेरिट का ऐतेवार नहीं है,
सजी है अर्थी नौकरियों की,
देश में अब रोज़गार नहीं है।
शमशान हुए बाज़ार यहां सब,
चौपट कारोबार यहां सब,
डॉलर पहुंचा आसमान पर,
रुपया हुआ लाचार यहां सब,
ग्राहक बिन व्यापार नहीं है,
देश में अब रोज़गार नहीं है।
चाय से चीनी रूठ गई है,
दाल से रोटी छूट गई है,
साहब खाएं मशरूम की सब्जी,
कमर किसान की टूट गई है,
देश में अब रोज़गार नहीं है।
दाम सिलेंडर के दूने हो गए,
कल के हीरो नमूने हो गए,
मेकअप - वेकप हो गया महंगा,
चांद से मुखड़े सूने हो गए,
नारी है पर श्रृंगार नहीं है,
देश में अब रोज़गार नहीं है।
साधु - संत व्यापारी हो गए,
व्यापारी घंटा - धारी हो गए,
चोर उचक्के नेता बन गए,
कैद में आंदोलनकारी हो गए,
सरकार में कोई सरोकार नहीं है,
युवा मगर लाचार नहीं है
देश में अब रोज़गार नहीं है। देश में अब रोज़गार नहीं है।
✍️पवन सिंह