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होली के शुभ अवसर पर शब्द क्रान्ति की तरफ से हार्दिक बधाई एवं नव वर्ष की शुभकामनाये । ...

17 दिसंबर 2014

इंसाफ-ए-पेशावर













वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
थी इतनी छोटी सी उम्र ।
 किया क्या था उसने जुर्म ।
अगर जुर्म उसने नहीं किया  ।
क्यों फिर ऐसा बदला लिया ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
पढ़ रहा था पाठ जीवन में,
इंसानियत और सच्चाईयों का ।
फिर क्या समझकर तुने,
तरफदारी किया बुराईयों का ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
कर दिया उनको किनारा,
सच्चाईयों की राह से ।
दरिंदों को मजबुती मिली है,
बुराईयों की स्याह से ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
अगर सियासत में खोट है,
तो क्या करेंगा ये चाँद तारा ।
सोचा था हमने एक दिन,
लाएंगे अमन और भाईचारा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
ये जमीं है तेरी,
ये वतन है तेरा ।
इस तन पे लिपटे,
कफन भी है तेरा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
एक दिन निकलना था,
घर-गली से बैंड-बाजा ।
उन्हीं गलियों से आज,
क्यों निकला है जनाजा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
मरने के बाद भी इंसानियत जज्बा हमारा,
बुराईयों का नाश ही है शपथ हमारा ।
हिम्मत और इंसानियत भरी हो,
अगर देना इस धरती पर जन्म दूबारा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
                         जे.पी.हंस



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