माननीय...................
बिहार
विषयः- सहायक प्रोफेसर की भर्ती में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
सिस्टम
की जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने एवं
डोमिसाईल
नीति लागू करने के संबंध में ।
महोदय,
सम्पूर्ण भारत में सहायक प्रोफेसर की
भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा से होती है पर हमारे बिहार लोक सेवा आयोग ने इस अति
उच्च योग्यता वाले पद को भरने में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
को भर्ती का आधार बनाया है । महोदय, हम निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर बिहार में
भी सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर करने एवं बिहार की
अपनी डोमिसाईल नीति लागू करने की मांग करते हैं ।
1.
महोदय, हमारे देश में कई बोर्ड
और कई विश्वविद्यालय है, जिनके मार्किंग पैटर्न में बहुत अंतर है- जैसे कठिन
सिलेबस के कारण बिहार बोर्ड के टॉपर को भी सी.बी.एस.ई
(C.B.S.E) बोर्ड और आई.सी.एस.ई (I.C.S.E)
बोर्ड
के औसत छात्रों से भी 20% तक
कम नम्बर मिलता है । इसके वजह से सहायक प्रोफेसर की बहाली में बिहार के विद्यार्थियों
को कम अवसर मिलता है ।
2.
महोदय, बिहार के लगभग सभी
विश्वविद्यालय भी भारत में सबसे कम मार्किंग के लिए जाने जाते हैं । इससे भी बड़ा
अंतर समेस्टर और ऐनुअल एक्जाम सिस्टम के प्राप्तांकों में है । ग्रेडिंग और नन
ग्रेडिंग के बीच प्राप्तांकों में तो और ज्यादा अंतर है- उदाहरणस्वरूप बिहार के
विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
(DU) और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में जहां 65%
पर
गोल्ड मेडलिस्ट हो जाता है वहीं बनारस हिन्दी विश्वविद्याल (BHU)
और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में
एक सामान्य छात्र भी 80% तक
अंक पाता है । ऐसे में प्रतियोगिता परीक्षा के जगह “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
के आधार पर भर्ती घोर अन्यायपूर्ण और अवसर की समानता के खिलाफ है ।
3.
महोदय, बिहार में सहायक
प्रोफेसर की नियुक्ति में इसी “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
नियम को आधार बनाया जाता रहा है, जिसके कारण बिहारी छात्रों को कम अवसर मिल पाता
है । चूंकि बिहार बोर्ड और बिहार के यूनिवर्सिटीज भारत के सबसे कम मार्किंग वाले
बोर्ड और यूनिवर्सिंटी है ।
4.
महोदय, “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
प्रणाली भर्ती की सबसे पुरानी पद्धतिओं में से एक है, जिसका प्रत्येक राज्य इनमें
व्याप्त खामियों को देखते हुए इसके जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित करवा रहें है ।
फिर हमारा राज्य क्यों न पुरानी पद्धति को त्याग कर नयी पद्धति- प्रतियोगिता
परीक्षा को अपनाये, क्योंकि हम बिहारी कठिन मेहनत और लगन के लिए जाने जाते है
और किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा सफलता हासिल करते हैं ।
5.
महोदय, मध्यप्रदेश, ओडिसा,
हरियाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश आदि अन्य अनेक राज्य खुली प्रतियोगिता
परीक्षा का आयोजन करवाते है एवं अपने-अपने राज्य का डोमिसाईल नीति भी लागू
करते है, जिससे वहां के मूल निवासी को नियुक्ति में ज्यादा अवसर मिलता है, उसी तरह
हमारा राज्य बिहार से भी खुली प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर सहायक प्रोफेसर की
नियुक्ति की उम्मीद करते हैं ताकि शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन हो सके,
साथ ही अपने राज्य की डोमिसाईल नीति को लागू किया जाये, जिससे यहाँ के मूल निवासी
को नियुक्ति में ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकें ।
6.
महोदय, बिहार में अब तक जितने
सहायक प्रोफेसर की भर्ती हुई है, उसमें बिहार के बाहर के विद्यार्थी ज्यादा से
ज्यादा नियुक्त हुए हैं । वें एक बार नियुक्त तो होते हैं पर इस ताक में रहते हैं
कि अपने स्टेट में किस तरह जाऊं, वे मन से यहां ड्यूटी भी नहीं करते हैं और अततः
वें यहाँ के भैकेन्सी बर्बाद कर अपने स्टेट चले जाते हैं । अगर डोमिसाईल नीति लागू
होता है तो बिहार के विद्यार्थियों को ज्यादा से ज्यादा अवसर मिलेगा और वे मन से
यहां ड्यूटी भी करेंगे । कहीं और जगह जाने की ताक में भी नहीं रहेंगे ।
7.
महोदय, हमलोग अहिंदी-भाषी राज्यों
में जा ही नहीं सकते, क्योंकि वे मूल भाषा का ज्ञान माँगते हैं और बाकि बचे हुए
हिंदी-भाषी राज्य भी मूल निवासियों को प्राथमिकता देते हैं । यहाँ तक कि राज्य के
बाहर के छात्रों के लिए उम्र अत्यंत कम रखी जाती है । ऐसे में हम बिहारी छात्र
जाएँ तो कहाँ जाएँ? क्या मज़दूर बनने को ही
हम अपनी नियति मान लें?
महोदय, अगर डोमिसाईल नीति लागू होती हैं तो यहाँ के छात्रों को ज्यादा से ज्यादा
अवसर मिलेगा और यहाँ के बेरोजगार युवकों की समस्या भी दूर होगी ।
अतः
हम महोदय से प्रार्थना करते हैं कि इस पुरानी पद्धति “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ”
प्रणाली के जगह खुली प्रतियोगिता परीक्षा
द्वारा भर्ती कराने एवं बिहार की अपनी डोमिसाईल नीति
लागू करने की कृपा करें, ताकि बिहार के निवासी को इस नियुक्ति में ज्यादा से
ज्यादा अवसर मिल सकें ।
निवेदक
निवेदक
बिहार
के सहायक प्रोफेसर के योग्य समस्त छात्र-छात्राएं