17 August, 2015

ना तुने हाल जाने, ना मैंने हाल जाने ।



ना तुने  हाल जाने, ना मैंने हाल जाने ।
बन कर अनजान बेवफा, क्यों भूल गए दिवाने ।
जिंदगी में क्या बचा है, क्या रह गए तराने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
सुबह-सुबह उठने पर, सोचते है ऑफिस जाने ।
समय का बड़ा पाबंदी है, न चलेगा कोई बहाने ।
बॉस से डॉट पड़ेगी, क्यों देर कर दी आने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
शाम को छूटने पर, सोचते है जल्द घर जाने ।
यहाँ भी पाबंदी है, न चलेगा कोई बहाने ।
मैडम से डॉट पड़ेगी, क्यों देर कर दी आने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
रात को कहाँ खैर है जब सो गए सिढ़ाने ।
सुबह का क्या इंतजाम है, इसे अभी है बताने ।
जिंदगी बन गई है फुटबॉल, क्यों कोई हाल जाने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
ना तुने  हाल जाने, ना मैंने हाल जाने ।
बन कर अनजान बेवफा, क्यों भूल गए दिवाने ।
जिंदगी में क्या बचा है, क्या रह गए तराने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
                                    -   जेपी हंस
                         


06 August, 2015

कैसे आजाद है हम ?

कैसे कहूँ कि हिन्द के वासी है आजाद ।
यूँ कहूँ कि हम पहले से ज्यादा है बर्बाद ।
फर्क तो सिर्फ इतना है ।
अब मत पूछना  कितना है ।
पहले लूटते थे गोरे, आज काले लूट रहे हैं ।
महारानी राज करती थी पहले, आज नेता जी राज कर रहे हैं ।
आते हैं वे गरीबों के दर पर पंचवर्षिय योजना की भाँति ।
भेदभाव फैलाकर कहते, हम नहीं पूछते किसी का धर्म-जाति ।
गरीब जनता को चाहते है वे रखना, अनपढ़-गवार ।
ताकि यह सुनिश्चित हो, कभी न हो उनकी राजनीति हार ।
जीतने के बाद तो वे दिखते नहीं, गरीबों के किसी गाँव में ।
तड़पाते है किसी काम पर, छाले पर जाते  गरीबों के पाव में ।
विकास का कार्य सिर्फ दिखते  है प्रोग्रेस रिपोर्ट में ।
जनता का है कोई नहीं, भगवान ही है केवल सुपोर्ट में ।
गरीबों के विकास की छाया दिखती है  उसकी शक्ल में ।
आजादी के  नाम पर होती बर्बादी, न घुसी उनकी अक्ल में ।
जिस दिन अक्ल खुल जाएगी, उस दिन होगी सच्ची आजादी ।
 नेता जी डर जाऐगे सब, रूक जाएगी सबकी बर्बादी ।