18 September, 2016

धरा की जननी कौन है?






विवश है आज धरा पर नारी,
अपनी अस्मत बचाने को ।
रक्षक ही भक्षक बन बैठे,
पल-पल उन्हें सताने को ।


मुद्दे जघन्य है जर्रा-जर्रा पर,
कर्तव्यवान जन क्यों मौन है ?
अब बताओं हे मानव !
धरा की जननी कौन है ?

पैरों तले लूट जाती इज्जत,
फैलती आसमां तक दूषित विचार ।
धिक्कार है जन्मना उस धरा पर,
जहाँ होती नारी का अपमान ।

छाई है चर्चा देश-दुनिया में,
नेतृत्व जन क्यों मौन है ?
अब बताओं हे मानव,
धरा की जननी कौन है ?

भूल गया क्या तु मानव,
धरा पर तुझको किसने लाया ।
तन-बदन पर पीड़ा सहकर,
कतरा-कतरा रक्त किसने बहाया ।

चर्चा है हर घर-चौपाल पर,
पास-पड़ोस जन क्यों मौन है ?
अब बताओ हे मानव,
धरा की जननी कौन है ?

रोती बिलखती गर्भस्थ गृह से ही,
अपनी जिंदगी बचाने को।
तड़पनी पड़ती है नव मास तक,
हर नर-नारी को जनमाने को ।

रूह कराहती तब जर्रा-जर्रा में,
पुरूषत्व कहाँ अब मौन है ।
अब बताओ है मानव,
धरा की जननी कौन है ?

कर ऐसी कारीगरी मानव,
मन से कर तु साक्षात्कार ।
भक्षक भक्ष कर, रक्षक रच कर,
नारी का कर सत्कार ।

चर्चे है हर जिह्वा-जिह्वा पर,
तरूणमन क्यों मौन है ?
अब बताओ है मानव,
धरा की जननी कौन है ?

         -जेपी हंस

12 September, 2016

हिंदी भाषा का इतिहास और विकास


हिन्दी मूलतः फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- हिन्दी का या हिंद से सम्बन्धित । हिन्दी शब्द की उत्पति सिन्धु-सिंध से हुई है, क्योंकि ईरानी भाषा में को बोला जाता है । इस प्रकार हिन्दी शब्द वास्तव में सिन्धु शब्द का प्रतिरूप है । कालांतर में हिंद शब्द सम्पूर्ण भारत का पर्याय बनकर उभरा । इसी हिंद से हिन्दी शब्द बना ।
      आज हम जिस भाषा को हिन्दी के रूप में जानते है, वह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है । आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत हैं, जो साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी । वैदिक भाषा में वेद, संहिता एवं उपनिषदों-वेदांत का सृजन हुआ है । वैदिक भाषा के साथ-साथ ही बोलचाल की भाषा संस्कृत थी, जिसे लौकिक संस्कृत कहा जाता है । संस्कृत का विकास उत्तरी भारत में बोली जाने वाली वैदिककालीन भाषाओं से माना जाता है । अनुमानतः 8वीँ शताब्दी ई.पू. में इसका प्रयोग साहित्य में होने लगा था । संस्कृत भाषा में ही रामायण तथा महाभारत जैसे ग्रन्थ रचे गये । वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, अश्वघोष, भारवी, माघ, भवभूति, विशाख, मम्मट, दंडी तथा श्रीहर्ष आदि संस्कृत की महान विभूतियाँ है । इसका साहित्य विश्व के समृद्ध साहित्य में से एक है । संस्कृतकालीन आधारभूत बोलचाल की भाषा परिवर्तित होते-होते 500 ई.पू के बाद तक काफी बदल गई, जिसे पाली कहा गया । महात्मा बुद्ध के समय में पालि लोक भाषा थी और उन्होने पालि के द्वारा ही अपने उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया । यह भाषा ईसा की प्रथम ईसवी तक रही ।
      पहली ईसवी तक आते-आते पालि भाषा और परिवर्तित हुई, तब इसे प्राकृत की संज्ञा दी गई । इसका काल पहली ई. से 500 ई. तक है । पालि की विभाषाओं के रूप में प्राकृत भाषाये-पश्चिमी, पूर्वी, पश्चिमोत्तरी तथा मध्य देशी अब साहित्यिक भाषाओं के रूप में स्वीकृत हो चुकी थी, जिन्हें मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री, पैशाची, ब्रांचड़ तथा अर्धमागधी भी कहा जा सकता है ।
      आगे चलकर प्राकृत भाषाओं के श्रेत्रीय रूपों से अपभ्रंश भाषाये प्रतिष्ठित हुई । इनका समय 500 ई. से 1000 ई. तक माना जाता है । अपभ्रंश भाषा साहित्य के मुख्यतः दो रूप मिलते है-पश्चिमी और पूर्वी । अनुमानतः 1000 ई. के आसपास अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ । अपभ्रंश से ही हिंदी भाषा का जन्म हुआ । आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म अपभ्रंशों के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से इस प्रकार माना जा सकता है-
अपभ्रंश-                  आधुनिक आर्य भाषा तथा उपभाषा
पैशाची-                  लहंदा, पंजाबी
ब्रांचड़-                   सिन्धी
महाराष्ट्री-                 मराठी
अर्धमागधी-               पूर्वी हिन्दी
मागधी-                   बिहारी, बंगला, उड़िया, असमिया
शौरसेनी-                  पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, पहाड़ी गुजराती

      उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि हिंदी भाषा का उद्भव अपभ्रंश के अर्धमागधी, शौरसेनी और मागधी रूपों से हुआ है ।

हिंदी के लिए क्या करें ।


1. स्त्रियां अपनी भाषा और शब्द-चयन को लेकर अपेक्षाकृत अधिक सजग होती है । यदि वे थोड़ी और जागरूक हो जाए, तो घर की नई पीढ़ी विदेशी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद अपनी भाषा और संस्कृति से बराबर जुड़ी रहेगी ।
2. विद्यालय में भले ही अंग्रेजी अनिवार्य हो, लेकिन घर पर मातृभाषा में ही बातचीत का नियम बनाए । भोजन, पूजा-पाठ, आत्मीय क्षणों में अंग्रेजी की कड़ी मनाही हो ।
3. बच्चों को अपनी भाषा में कहानियां-कविताएं पढ़ने के लिए प्रेरित करें । स्वयं भी पठन-पाठन में शामिल होकर उनमें रूचि जगाए ।
4. बच्चों को अपनी भाषा के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक लाभों के बारे में बताएं ।
5. बेटी के साथ बेटे को भी रसोई और धार्मिक-सांस्कृतिक रीति-रिवाजों की शब्दावली से परिचित कराएं ।
6. यदि वे अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करे, तो वैकल्पिक हिंदी शब्द बताएं ।
7. हिंदी क्षेत्र के निवासी, अहिंदी परिवार के बच्चे दोस्तों से हिंदी में बोले । इस तरह से भाषा की सजगती बढ़ेगी ।
8. गैर-हिंदी भाषी से बात करें, तो उसकी टूटी-फूठी हिंदी को भी प्रोत्साहित करें । यदि आप जानते हो कि कोई व्यक्ति हिंदी क्षेत्र का है या हिंदी जानता है, तो उससे अंग्रेजी में बात न करें । अंग्रेजी उसकी मजबूरी हो सकती है, आपकी नहीं । वह अंग्रेजी में प्रश्न करे, तो आप हिंदी में उत्तर दें ।
9. ऐसी जगहों पर आप सेवाएं खरीदते है, यानी ग्राहक होते हैं । आप पैसे देते हैं, सो आपका दर्जी ऊंचा होना चाहिए । लेकिन होता उल्टा है । बैरा और अन्य कर्मचारी अंग्रेजी में बोलते हैं और आप कमतर न समझ लिया जाएं, इस डर से उसी की भाषा में बोलने लगते है । इसके बजाय, हिंदी में पूछे हिंदी में बताएं । यह बात गांठ बांध लीजिए कि यदि आपकी जेब में खर्च करने को पैसे है, तो वे हिंदी ही नहीं, आपकी स्थानीय बोली को भी झख मारकर समझेंगे ।
10. प्रपत्र, मतलब फॉर्म, चाहे बैंक का मामला हो या जीवनबीमा का, हिंदी प्रपत्रों की मांग करें । यहां भी नियम और शर्तें हिंदी में पूछे । राशियों की गणना के लिए हिंदी का सहारा लें । अंग्रेजी अंकों में बताया जाए, तो हिंदी में पूछे । यहीं नहीं, आप पासबुक और एटीएम पर्ची के लिए भी हिन्दी की मांग कर सकते है । अपनी भाषा में जानकारी प्राप्त करना आपका मौलिक अधिकार है ।
11. घर खरीदते समय या जमीन या फिर अनुबंध करते समय, उसके दस्तावेज अपनी भाषा में मांगे । अपनी भाषा में आप नियम-शर्तों को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे और धोखा खाने या किसी महत्वपूर्ण बात के नजर से चूक जाने के आसार कम ही होंगे । इसका एक लाभ यह भी होगा कि करोड़ो-अरबों का कारोबार करने वाले लोग हिंदी की अहमियत समझेंगे और हिंदी के अच्छे जानकारों को बतौर अनुवादक ही सही, रोजगार मिलेगा ।
12. सफर  के दौरान हिंदी की पत्रिकाएं और समाचार पत्र मांगे, खरीदें । पर्यटन स्थलों और अपनी भाषा में जानकारी की मांग करें ।
13. एक बात विशेष रूप से जान ले कि जब आप भुगतान करके सेवाएं खरीदते हैं, तो आप ऊंची स्थिति में होते हैं । कम से कम ऐसी जगहों पर अपनी भाषा को लेकर संकोच न करें ।
14. आज तकनीकी का दौर है इस दौर में स्मार्टफोन, टबलेट और कम्प्यूटर/लैपटॉप का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है । इसे इस्तेमाल करते समय भाषा का चयन हिंदी का करें ।
15. आज सोशल साइट का ज्यादा क्रेज बढ़ा है, इस पर अपनी विचार व्यक्त करते समय हिंदी का प्रयोग करें । हिंदी में भाषा को बदलने के लिए सभी सोशल साइट्स की सेंटिंग में हिंदी उपलब्ध है ।
16. भारत भी सोशल साईट बनाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है इसलिए बेहतर होगा विदेशी सोशल साइट के बदले स्वदेशी सोशल साइट का प्रयोग करें । फेसबुक की जगह शब्दनगरी, ट्विटर की जगह मूषक, व्हाट्सएप्प की जगह जिओ चैट उपलब्ध है, इसकी प्रयोग करें ।

17. स्मार्टफोन में हिंदी भाषा का प्रयोग करने के लिए प्ले स्टोर में हिंदी कीबोर्ड के अनेक एप्पस मौजूद है इसे इन्सटॉल कर, सेटिंग में हिंदी का चयन करें ।

हिंदी से जुड़ी रोचक बातें ।

1. हिंदी की लिपि
देवनागरी है । यह दो भिन्न शब्दों से बना समस्त पद है । देवअर्थात ईश्वर तथा नागरी अर्थात नगर अथवा शहर से संबंधित । इस शब्द की व्युत्पति यह बताती है कि एक काल विशेष में यह लिपि एक मुख्य व्यवहार के लिए प्रयुक्त हुई होगी ।
2. वेद, पुराण आदि कई हिंदू धर्मग्रंथ देवनागरी में ही रचे गये है, जबकि इसके परिवर्तित रूपों में शिलालेख और पट्ट-आलेख उपलब्ध है । अतः इतिहासविदों तथा पुरातत्वविदों के लिए देवनागरी को जानना-समझना अत्यावश्यक माना गया है ।
3. सातवीं ईस्वीं में हिंदी का आविर्भाव अपभ्रंश से हुआ । 10वीं सदी के अंत तक इसके स्वरूप में स्थिरता आ गया । ब्रज, अवधी तथा खड़ी बोली आदि हिंदी की बोलियां अथवा उपभाषाए हैं । हिंदी का वर्तमान साहित्यिक मानक रूप खड़ी बोली पर आधारित है ।
4.  भाषा के विकास-क्रम में अपभ्रंश से हिंदी की ओर आते हुए भारत के अलग-अलग स्थानों पर अलग भाषा शैलियां जन्मी । हिंदी उनमें से सबसे अधिक विकसित थी । अतः उसे भाषा की मान्यता मिली । अन्य भाषा शैलियां बोलियां कहलायी ।
5. हिंदी का संबंध भारोपीय भाषा परिवार की उपशाखा भारत-ईरानी की भारतीय आर्यशाखा समूह से है । इसे भारतीय संघ की राजभाषा होने का गौरव प्राप्त है तथा इसकी लिपि देवनागरी हैं ।
6. हिंदी की विकास यात्रा दिल्ली, कन्नौज और अजमेर क्षेत्रों में हुई मानी जाती है । पृथ्वीराज चौहान का उस वक्त दिल्ली में शासन था । चंदबरदाई उनके दरबारी कवि हुआ करते थे । कन्नौज का अंतिम राठौड़ शासक जयचंद था, जो संस्कृत का बहुत बड़ा संरक्षक था ।
7. जहां काव्य में हिंदी के विकास को छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, प्रयोगवादी युग और यथार्थवादी युग इन चार नामों से जाना गया. वहीं गद्य में इसको, भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, रामचंद शुक्ल व प्रेमचंद युग तथा अद्यतन युग का नाम दिया गया ।
8. वर्ष 1850 ई. में हिन्दी शब्द का प्रयोग उस भाषा के लिए समाप्त हो गया. जिसे अब उर्दू कहा जाता है । वर्ष 1900 में सरस्वती पत्रिका में किशोरी लाल गोस्वामी की कहानी इंदुमति का प्रकाशन हुआ । यह हिंदी की पहली कहानी मानी जाती है ।
9. वर्ष 1913 में दादा साहब फाल्के ने राजा हरिश्चंद नामक प्रथम हिंदी फिल्म (चलचित्र) का निर्माण किया । वर्ष 1931 में हिंदी की पहली बोलती फिल्म आलम आरा परदे पर आयी ।
10. हिंदी भाषा के लिए इस शब्द का प्राचीनतम प्रयोग सरफुद्दीन यज्दी के जफरनामा (1924) में मिलता है ।
11. अमीर खुसरो के खालीक बारी (1283) में पहली बार हिंदी का प्रयोग केवल पांच बार हुआ है, जबकि हिंदवी का तीस बार प्रयोग हुआ है ।
12. 1826 ई. में पहला हिंदी समाचार पत्र उदंत मार्तण्ड निकला ।
13. प्राप्त प्रमाणों में 933 ई. की श्रावकाचार नामक पुस्तक अपभ्रंश हिंदी का पहला ग्रंथ है, परन्तु अमीर खुसरो हिंदी के वास्तविक जन्मदाता थे, जिन्होंने 1283 में खड़ी बोली हिंदी को इसका नाम हिन्दवी दिया । तब से ही यह हिन्दवी, हिन्दी बनती गई, बढ़ती, चढ़ती गई है ।  

हिन्दी हूँ मैं....



निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल.
      उपरोक्त पंक्तियाँ भारतेंदु हरिश्चंद ने हिंदी के बारे में वैसे समय में लिखी, जब उन्हें लगा कि अब हिंदी के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है । इसी खतरे को भांपते हुए उतरोत्तर समय में 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी । हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
      वैसे जो ऐसी कल्पनाएं करके ही खुश होते है कि हिंदी दिवस मनाने वाले मानते हैं कि भाषा का संकट है, तो उन्हें अपनी खुशगहमी दूर कर लेनी चाहिए, क्योंकि यह दिन मनाना संकट का घोतक नहीं, बल्कि अपने ही देश में, सैलानियों की तरह रह रहे लोगों को याद दिलाने का तरीका है कि मुखौटे उतारो और सच्ची जबान बोलो ।
      अपनी भाषा बोलने में हिचक होने और आत्म-विश्वास की कमी को कारण हमारे स्वतंत्रता पूर्व और स्वाधीनता प्राप्ति के बाद के शासन की गलत शिक्षा नीतियों के कारण हिंदी उपेक्षा की शिकार रही है । जिस स्वाधीनता संग्राम को भारतीय भाषाओं ने लड़ा, उसी स्वाधीनता के प्राप्ति के बाद उन्हें दरकिनार कर दिया गया । स्वाधीनता प्राप्ति के सारे दस्तावेज ही न केवल अंग्रेजी में हस्ताक्षरित किये गये, बल्कि आधी रात को देश के प्रथम प्रधानमंत्री का स्वाधीनता प्राप्ति का पहला भाषण ही अंग्रेजी में दिया गया । यही वह क्षण था, जहाँ से हिंदी ही नहीं, तमाम भारतीय भाषाओं की दुर्गति शुरू हुई ।
      हमारी हिचकिचाहट हमारी मनोवैज्ञानिक दासता में अंतर्निहित है । उसके ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय कारण उतने नहीं है, जितने मनोवैज्ञानिक और वर्गीय कारण हैं । स्वाधीनता के तत्काल बाद स्वाधीनता संग्राम के उन्हीं नेताओं को, जो नई सरकार में मंत्री बनाए गए । उन्हें लगा कि अब वे जनता से कुछ अलग और विशिष्ट हो गए है, क्योंकि अब वे शासक हो चुके थे । उनके सामने यह समस्या हुई कि वे जनता से अलग दिखने के लिए क्या करे, तो उन्हें पहला हथियार मिला भाषा का । उन्होंने तत्काल अपने कामकाज की भाषा के लिए अंग्रेजी को चुन लिया ।

      एक क्षेत्र-विशेष के प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले कुछ लोग तो राजनितिक रोटियां सेकने में अरसे से हिंदी विरोद्ध का झंडा उठाते रहे हैं । जब यूपीएससी में हिंदी को लागू करने की बात उठी तो एक बार फिर से सक्रिय रूप से उसके विरोध पर उतर आये थे, अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करने तक पर उन्हें एतराज है यानि अपने ही देश में हिंदी लगातार विरोध के चक्रव्यूह में फंसती और लड़ती रही है । सरकारी स्तर पर उसे आज तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिला है मगर कमाल यह है कि इतने सबके बाद भी हिंदी न हारी, न टूटी, न मरी, न गई अपितु आज दुनियाभर में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शुमार है तथा चीनी या मंडारिन के बाद उसका दूसरा स्थान है । भले ही हिंदी उस देश में ठिटकी खड़ी है, जहाँ सब उसके अपने है, पर एक बेगानेपन से त्रस्त होकर भी उसने उम्मीद नहीं छोड़ी है और हिंदी में जबरदस्त वृद्धि हो रही है, उसकी पठनीयता और साहित्य कुलांचे भर रहा है और कह रहा है हिन्दी हूँ मैं