13 March, 2017

हमारी नव वर्ष आई है।

छटा धुंध कुहासा हटी
फागुनी रूप निखराई है।
प्रकृति दुलहनि रूप धरकर
स्नेह सुधा बरसाई है ।
हमारी नव वर्ष आई है।
शस्य- श्यामला धरती माता
घर-घर खुशहाली लाई है।
चैत- शुक्ल की प्रथम तिथि
नव तरंग फैलाने आई है।
हमारी नव वर्ष आई है।
मरु तरु श्रृंगारित होकर
बहारे आँचल में फागुन आई है।
आर्यावर्त की पावन भूमि पर
होली की तान सुनाई है।
हमारी नव वर्ष आई है।
        - जेपी हंस
होली और नव वर्ष की आपको और आपके पूरे परिवार को हार्दिक बधाई....

12 March, 2017

होली की शुभकामनाएं...

होली की हर्षित बेला पर, खुशियां मिले अपार।
यश,कीर्ति, सम्मान मिले, और बढे सत्कार।।
शुभ रहे हर दिन हर पल, शुभ रहे विचार।
उत्साह बढे चित चेतन में, निर्मल रहे आचार।।
सफलतायें नित नयी मिले, बधाई बारम्बार।
मंगलमय हो काज आपके, सुखी रहे परिवार।।
आप और आपके परिवार को "होली की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं"....
जयप्रकाश नारायण उर्फ जेपी हंस

होली की यादें- भाग-2

बात आज से 18-19 वर्ष पहले की है, जब मैँ अपने ननिहाल में रहता था । होली में हमलोग गोबर और कीचड़ को एक- दूसरे पर फेककर मजे लेते थे । कोई भी व्यक्ति इस दौरान खाली नहीं जाता था । होली के दिन सुबह में हमलोग बाल्टी में गोबर घोलकर रखते थे । मेरे ननिहाल में नाना जी के घर के बगल से गली गुजरती है । इस गली से दूसरे गाँव के व्यक्ति अपने गाय, भैस, बैल को नदी में धोने के लिए ले जाते थे। सब हमारे नाना जी के घर से होकर जाते थे। मैं अपने ममेरे भाइयों के साथ छत से गली से गुजरने वाले सभी व्यक्तियों को गोबर घोरकर पराते थे, जिसे हम लोगों को बड़ा मजा आता था। हद तब हो गयी जब एक ऐसे व्यक्ति पर गोबर के घोल फेक दिया जो नदी से अपने जानवर को धोकर और खुद स्नान करके आ रहा था । फिर क्या था, हम लोग नाना जी के पिटाई के डर से छिप गए, लेकिन शाम को डांट सुननी ही पड़ी ।
जयप्रकाश नारायण
रामनगर, जमशेदपुर, झारखंड

होली की यादें- प्रभात खबर में प्रकाशित

होली की यादें...


एक बार होली में हमारे ननिहाल में नई नवेली मामी आई हुई थी । उस होली के दिन मैंने होली के सुबह धुरखेली के समय गोबर और कीचड़ से बचने के लिए छत पर एक ऐसी जगह बैठा था, जहाँ अभी छत पूरी तरह नहीं बने थे । इस जगह पर इसलिए बैठा था ताकि कोई गोबर और कीचड़ न लगाये। उस दिन जब खाना खाने का समय हुआ तब भी में उसी छत पर बैठा था, लेकिन नानी के बार-बार बुलाने पर छत से किसी तरह उतरा । मेरी नई मामी यह दिलासा देकर छत से उतरवाई की कोई भी गोबर या कीचड़ नहीं लगाएंगे। मै पूरे विश्वास के साथ उतरा और कुआं पर जाकर हाथ- पैर धोने लगा । हाथ- पैर धोने के लिए मेरी नई मामी ने पानी दी थी। मैं ज्योंहि हाथ- पैर धोने के लिए झुका, तब नई मामी ने गोबर के घोल से भरे बाल्टी को मेरे माथे पर उझल दिया। मै पूरी तरह भींग गया। फिर भी बहुत खुश हुआ । यह बात मुझे आज भी होली आने पर यादों को ताजा कर देती है।
जेपी हंस,
जमशेदपुर, झारखंड