वो पुरानी चश्मा बुढ़ी
नानी के ।
नित्य धूल झाड़ कर,
रेक पर ऐसे सहजती,
मानो कोई अनमोल हीरा
।
वो हीरा ही था,
नानी के लिए,
हर चीज देख पाती आज
भी ।
जैसे वह वर्षों पहले
देखा करती थी ।
उसे पहनकर,
जवानी अहसास होती ।
वरना, खो जाने पर,
बेसहारा बुढ़ापे की
कसक में
सपने बुनती रहती ।
आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन भगवान को भेंट - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।
ReplyDeleteबढ़िया
ReplyDeleteआभार...
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