“डरो
मत अभी मैं जिंदा हूँ”
के चमत्कारिक नारों की उद्घोषणा करने वाले, भारतवर्ष में गाँधी जी के बाद सबसे
लोकप्रिय राजनेता जिसने राज सत्ता से दूर रहकर लोक सत्ता, लोक नीति तथा लोक-चेतना
का जीवन पर्यन्त पालन करने वाले, दलगत राजनीति को त्याग, सादगी, समता और सर्वोदय
की त्रिवेणी में गोता लगाने वाले युग पुरुष श्री जयप्रकाश नारायण का जन्म
उत्तर-प्रदेश और बिहार की सीमाओं का निर्धारण करने वाली पतित पावनी गंगा के कटाव
पर स्थित सिताब दियारा गाँव में 11 अक्टूबर, 1902 को हुआ था । सिताब दियारा गाँव
बिहार के सारण जिले में स्थित है । उन्होंने सनं 1919 में हाईस्कूल परीक्षा प्रथम
श्रेणी से उतीर्ण किया । 1921 में इंटरमीडिएट की परीक्षा में न बैठकर उन्होंने
छात्राओं और छात्रों को कॉलेज छोड़ने का आग्रह किया । बाद की पढ़ाई श्री जयप्रकाश
नारायण ने विदेश जाकर पूरी की । वह 17 मई, 1922 से सितम्बर 1929 तक अमेरिका में
रहे और कुछ न कुछ कार्य करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी की । उन्होंने ओहिया
विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की ।
विदेश से लौटकर श्री जयप्रकाश नारायण ने जैसे ही अपनी
मातृभूमि पर कदम रखा तो उन्हें लगा जैसे दासता की लौह श्रृंखला में आबद्ध भारत
माता उन्हें धिक्कार रही हो, सागर की विवश तरंगे जैसे उन्हें ललकार रही हों और
ब्रिटानी सल्तनत का दमन-चक्र उनके सामने चुनौती दे रहा था । यह वह समय था, जब देश
में स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था । उनका मानस पटल उद्वेलित हो उठा, भुजाएं फड़कने
लगी और उनका यौवन हुंकार भरने लगा तब जवाहर लाल नेहरू के पारिवारिक सदस्य बनकर
आनंद भवन, इलाहाबाद में रहने लगे । उन्होंने कांग्रेस को मजबूत बनाने के लिए संगठन
पक्ष को अपनी शक्ति प्रदान की । यह काम अंग्रेजों की नजर में संगीन जुर्म था इसलिए
उन्हें 1932 ई. में नजरबंद कर दिया गया । स्वाधीनता आंदोलन के तूफानी सफर में
अनेकों बार वे कारागार के शिकंजों में जकड़ दिए गए, उन्हें घोर यातनाएं दी गयी.
लेकिन उनका सफर नहीं रूका, बल्कि और भी तीव्रतर होता गया । कारागार की कालकोठरियों
में उत्पन्न उनकी विप्लवी विचारधारा ने कांग्रेस की नीतियों को नकार दिया और उसी
ने मई. 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी को जन्म दिया । 11 अप्रैल, 1946 को जब
लाहौर जेल से उन्हें मुक्ति मिली तब वे युवकों और क्रांतिकारियों का हृदय सम्राट
बन चुके थे ।
15 अगस्त, 1947 को जब भारत विदेशी दासता की बेड़ियों से
आजाद हुआ तब भारतवासी देश के नव-निर्माण के स्वप्निल सागर में गोते लगा रहे थे,
तभी अचानक 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गाँधी की निर्मम हत्या हो गया तब वे विचलित
हो उठे और गाँधीवाद के प्रवाह में बहते चले गए । युवावस्था में वे मार्क्सवाद और
लेनिनवाद के घोर समर्थक थे ।
जब भारत आजाद हुआ तब कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन श्री
जयप्रकाश नारायण ने अपने को सता की राजनीति से दूर रखा । हालांकि उनको भारत का
प्रधानमंत्री बनाने की आवाज भी उठ चुकी थी, लेकिन उन्होंने नकार दिया । वे राजनीति
से अलग रहकर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति सतत संवेदनशील रहे ।
इन्हीं लोक सेवा के कारण उन्हें सनं 1965 में “मैंग्सेसे
पुरस्कार” से सम्मानित किया
गया ।
सन् 1974 आते-आते देश के तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के
विरुद्ध असंतोष की लहर व्याप्त होने लगी । गुजरात में नौजवानों ने आंदोलन छेड़
दिया । बिहार में भी छात्रों का असंतोष विस्फोटक हो उठा और छात्रों एवं युवाओं ने
आंदोलन का नेतृत्व संभालने हेतु श्री जयप्रकाश नारायण से अनुरोध किया । 9 अप्रैल,
1974 को पटना के गाँधी मैदान की एक सभा में छात्रों ने श्री जयप्रकाश नारायण को “लोकनायक”
की उपाधि से विभूषित किया । उन्होंने जब आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार करने की घोषणा
की तो संपूर्ण देश का राजनैतिक माहौल गरमा गया । 5 जून, सन् 1974 को पटना के गाँधी
मैदान की विशाल ऐतिहासिक सभा में लोकनायक ने संपूर्ण क्रांति की घोषणा की । 25 जून
की रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया तथा श्री जयप्रकाश नारायण सहित सभी
विरोधी दलों के सभी प्रमुख नेताओं को जेल भेज दिया गया । जेल मे वे अस्वस्थ हो गए
क्रमशः उनकी स्थिति नाजुक होती गई । दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान
और फिर बम्बई के जसलोक अस्पताल में डायलिसिस के सहार चिकित्सा चलती रही । जनवरी,
1977 मे देश में आम चुनाव की घोषणा हुई तो जयप्रकाश ने सभी विरोधी दलों को एक मंच
पर इकटठा किया, जिसमें भिन्न सिद्धांतों के गठजोड़ से जनता पार्टी का जन्म हुआ और
मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व में केन्द्र में जनता सरकार गठित हुई । उनका
स्वास्थ्य ज्यादा साथ नहीं दे सका, अंततः 8 अक्टूबर, 1979 को उनका देहांत हो गया ।
आज बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में इनके अनुयायी ही सक्रिय है ।