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21 सितंबर 2014

राजभाषा हिन्दी पर आलेख

राजभाषा हिन्दी पर आलेख
            संसार में कोई भी देश ऐसा नहीं है, जिसने अपनी मातृभाषा को भुलाकर किसी विदेशी भाषा के माध्यम से प्रगति की हो। राष्ट्रीय एकता एवं गौरव की पहचान हिन्दी ने ही स्वतंत्रता के आंदोलन को सफलता तक पहुँचाया था। आधुनिक भारत का निर्माण अंग्रेजी से नहीं, भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही संभव हो सकता है।
            आज से ठीक 63 वर्ष पूर्व 14 सितम्बर, 1949 के दिन संविधान सभा द्वारा हिन्दी को भारत संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता दी गई थी। सरकार ने सम्पूर्ण भारत को राजभाषा के कार्यान्वयन की दृष्टि से तीन भाषिक क्षेत्रों के अंतर्गत रखा हैः (1) क्षेत्र से बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली। (2) क्षेत्र से गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब के राज्य तथा चण्डीगढ़ संघ राज्य क्षेत्र । (3) क्षेत्र से उक्त एक और दो के अतिरिक्त सभी राज्य। इन क्षेत्रों में रखने का तात्पर्य कदापि नहीं है कि सिर्फ ही राज्यों में अधिकांश कार्य हिन्दी भाषा में होगा। जहाँ क्षेत्र जन-सुविधा एवं कर्मचारियों के हिन्दी ज्ञान को देखते हुए आरम्भिक चरण में ही समस्त कार्य हिन्दी में आरम्भ कर दिया जाना है वहीं अन्य क्षेत्रों के कार्यालयों में राजभाषा के कार्यान्वयन के प्राथमिक चरण में कर्मचारियों को हिन्दी में कार्य करने हेतु समर्थ बनाने पर अधिक बल दिया जाना है और भारतीय भाषाओं का विकास करना है।
            संविधान के निर्माताओं ने सोचा था कि अंग्रेजी का प्रयोग धीरे-धीरे कम करके भारतीय भाषाओं और हिन्दी का प्रयोग होने लगेगा क्योंकि अंग्रेजी देश को दो हिस्सों में बाँटती है। एक तो ऐसा वर्ग है जो अपने को आम जनता से अलग कर अंग्रेजी भक्त होने के कारण स्वयं को खास कहता है। दूसरा हिन्दी प्रेमी आम जनता है। हिन्दी राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रीय सम्मान और राष्ट्रीय एकता का माध्यम है। हिन्दी भाषा का साहित्य अत्यन्त ही समृद्ध है। हिन्दी ने राष्ट्र को एक समृद्ध साहित्य दिया है। हिन्दी में कबीर, सूर, तुलसीदास, रहीम, रसखान, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, सोहन लाल दिवेदी, हजारी प्रसाद दिवेदी, मुंशी प्रेमचन्द आदि अनेक कवियों और लेखकों की परम्परा रही है।
            राजभाषा और राष्ट्र की सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी को अकस्मात ही नहीं चुना गया, इसकी महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि रही है। 19वीं शताब्दी में स्वामी दयानन्द, केशव चंद सेन, ईश्वर चंद विद्यासागर, बाल गंगाधर तिलक जैसे समाज सुधारकों ने समस्त भारत के लिए इसे सम्पर्क भाषा के रूप में चुना था। इतिहास साक्षी है कि हिन्दी ने सम्पर्क और साहित्यिक भाषा के रूप में उत्तरी भारत ही नहीं मध्यभारत से आगे जाकर दक्षिण तक में अपनी प्रभावशालिता को बढ़ाया। आज वह विश्व में सर्वाधिक समझी जाने वाली भाषा है। राष्ट्रपित महात्मा गांधी, श्री मदन मोहन मालवीय, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, डॉ राजेंद्र प्रसाद, राजर्षि टंडन जी, डॉ रघुवीर, डॉ लोहिया आदि ने हिन्दी को राष्ट्रीय आंदोलन का एक हिस्सा ही बना दिया था। उसके फलस्वरूप ही देश के कोने-कोने में राष्ट्रीय चेतना व्याप्त हो गई थी, क्योंकि हमारे महापुरुष यह सच्चाई जानते थे कि अंग्रेजी का माध्यम से केवल कुछ प्रतिशत लोगों तक ही पहुँच हो सकती थी, जबकि हिन्दी के माध्यम से राष्ट्र को एक सूत्र में बाँध सकते थे। अंग्रेजी मानसिक गुलामी का प्रतीक है मानसिक गुलामी से मुक्ति प्राप्त किये बिना हम सही अर्थों में, सच्चे अर्थों में स्वतंत्र भी नहीं हो सकते थे।
            हिन्दी केवल भाषा ही नहीं, यह भारत की स्वत्व, अस्मिता और संस्कृति की भी प्रतीक है। समाज में चेतना जागरण का भाव, देशभक्ति का भाव, अपनी संस्कृति और जीवन मूल्यों का ज्ञान भाषा के माध्यम से ही दिया जा सकता है। हिन्दी वह भाषा है जिसके माध्यम से हमने स्वतंत्रता आंदोलन को सारे देश में गुंजायमान किया और उसके संदेश को घर-घर तक पहुंचाया। आज भी हिन्दी ही हम सबको एकता के सूत्र में बाँध सकती है और समाज तथा राष्ट्र को समृद्धशाली बना सकती है।
            संविधान के अनुसार आज भारत की राजभाषा हिन्दी और अंग्रेजी सहायक भाषा। कई कारणों से हिन्दी को उतना महत्व नहीं मिल पा रहा है जितना उसे मिलना चाहिए। फिर भी किसी न किसी दिन हिन्दी को हमारे देश की राजभाषा बनना है साथ ही दूसरी प्रादेशिक भाषाओं का भी राष्ट्रीय स्तर के लिये विकसित करना है, तभी हमें अंग्रेजी से छुटकारा मिल सकता है। इसलिए हिन्दी के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह राजभाषा के स्थान को ग्रहण करने के लिए ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों को सशक्त अभिव्यक्ति देनेवाली भाषा के रूप में अपने में ऊर्जा पैदा करें इसके लिए हिन्दी सेवियों, हिन्दी लेखकों और साहित्यकारों को निरन्तर प्रयास करने की आवश्यकता है कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में विकसित किया जाये, कम्प्यूटर, इंटरनेट और ई-मेल की भाषा बनाया जाए और इसे आम जनता तक पहुँचाया जाये। सभी विषयों की मानक शब्दावली प्रादेशिक भाषाओं और हिन्दी भाषा की एक ही बनाई जाय ताकि सभी प्रादेशिक भाषाओं में भी समानता का भाव पैदा हो।
            हमारा लक्ष्य होना चाहिये कि हिन्दी केवल बोलचाल की भाषा बनने तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि यह आम आदमी की व्यवहारिक, अदालती, सरकारी कार्यों की भाषा बने। अतः यह आवश्यक है कि हम अपने दैनिक व्यवहार में हिन्दी को अपनायें। अपने संस्थान के समस्त पत्राचर, निमंत्रण-पत्र, आवेदन, नाम-पट्टों और सार्वजनिक कार्यों में हिन्दी का प्रयोग करें। हिन्दी में सोचें, हिन्दी में लिखें। हिन्दी को हम केवल अनुवाद की भाषा ही बनाकर नहीं चलें। जब हम मूल रूप में हिन्दी में सोचने, समझने और लिखने की आदल डालेंगे और हिन्दी की हमें आवश्यकता क्यों है इस बात को समझेंगे और अन्य लोगों को समझायेंगे तब ही हिन्दी का विकास होगा और राष्ट्रीय एकता का संदेश जाएगा।


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