27 April, 2020
काहे भूल गई माई हमके (भक्ति गीत)
दर्शन दो मईया दर्शन दो (भक्ति गीत)
20 April, 2020
आदमी या आदमखोर
आज हमें यह सोचने को विवश होना पड़ रहा है कि हम किस युग में जी रहे हैं, एक तरफ
कोरोना जैसे गंभीर महामारी से घिरा इंसान अपनी जिंदगी बचाने के लिए घर में कैद
रहकर अपने रिश्ते-नातों/सगे-संबंधियों से दूरी बनाने को मोहताज हैं, वहीं दूसरी ओर
भीड़ तंत्र घरों से बाहर निकलकर खुशहाल इंसानी जिंदगी को मौत के मुँह ढकेल रहा.
परिवर्तन संसार का नियम है. जंगलों में रहने वाला बंदर
आज घरों में रहने वाला इंसान बन गया है. ये कब हुआ बहुत समय गुजरा.
लेकिन क्या आज इंसान किसी रूप में परिवर्तन
ले रहा है, तो कहूँगा, हाँ, बिल्कुल… यह इंसान से
हैवान, मानव से दानव और आदमी से आदमखोर में प्रवेश ले रहा है… यह परिवर्तन तो इंसानी
आंखों के सामने हो रहा है…
पर, इसके परिवर्तन के लिए दोषी कौन ?
कुछ अनैतिक रूप से पाने के लिए इंसानों द्वारा फैलाया जाने वाला भ्रम, अफवाह, भड़काऊ युक्त बयान, पोस्ट, कॉमेंन्ट्स या दकियानुसी सोच…
यह सोचना पड़ेगा कि वर्तमान में जनमानस पर
जो दूषित विचार फैला रहा हैं, वो कौन लोग है, जिन्हें इस दूषित विचार से ही केवल
सुखद अहसास महसूस होता है ?
साथ ही मिडिया चैनलो मे बैठकर धर्म और जाति
के मुद्दे पर भड़काने वाले महानुभाव...जिन्हें किसी मुकदमे में नाम आते ही बचाने
के लिए आने वाले परजीवी जीव...
राजनितिक पार्टियों के आई.टी सेल, जो फर्जी
अकाउंट बनाकर विरोधियों के सात पुश्तों को माँ-बहन की श्लोकोच्चारण और मंगल गीत
गान करने से परहेज नहीं करते या वो जिन्हें इंसानी सेल से ज्यादा साइबर सेल पर ज्यादा
विश्वास रहता है.
इन सबके बीच यह भी सोचना पड़ेगा कि किस जगह पर असहमति के अधिकार बचे है या हर मामले
में किसी से सहमत ही हुआ जा सकता है...
क्या असहमत होने वाले ही सोशल मीडिया के बाद
समाज में भीड़-तंत्र का हिस्सा बन रहे हैं ?
हालात तो इतना तक बन रहा है कि कोई भी पोस्ट लिखने पर असहमति वाले अपनी सात
पुश्तों के संस्कार को तिलांजली दे नये संस्कार को जन्म दे रहा...
क्या नये संस्कार ही आदम युग का हिस्सा बन
रहा...
ये भी सोचना पड़ेगा कि आदमी को आदमखोर बनने
की प्रवृत्ति कब से शुरू हुई...
अंत में मशहूर शायर राहत इंदौरी के शब्दों में,
‘अगर खिलाफ हैं होने दो जान थोड़ी है,
ये सब धुआं है कोई आसमान थोड़ी है,
लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में,
यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है,
-जेपी
हंस
Note: फोटो गूगल से संभार.
19 April, 2020
बहुत याद आती है तेरी
वो ऑफिस पहुँचकर
सबको दुआ-सलाम करना,
बगल में लगे,
माँ सरस्वती को चरण स्पर्श
करना,
आई.टी.बी.ए पर वर्क करना,
कितना अच्छा लगता था न ।
पानी की बोतल उठाकर,
गटक-गटक कर पीना,
कभी कैंटीन निकल जाना,
चाय ऑफि में रहते हुए भी,
बाहर जाकर चाय पीना,
कितना अच्छा लगता था न ।
फिर दोस्तों के साथ लंच
करते-करते
गप्पे करना
काम के लिए,
कभी उस साहब के पास,
तो कभी इस साहब के
पास जाना ।
कितना अच्छा लगता था न ।
-
जेपी हंस
हाँ, मैं मजदूर हूँ न !
भारतीय मजदूर,
सदियों से शोषित,
वर्षों से पीड़ित रहने वाला,
कभी जमींदारों के गुलाम,
कभी पूजीपतियों के गुलाम,
गुलामी ही जिसका नसीब
वहीं जंजीर हूँ न !
हाँ, मैं मजदूर हूँ न !
बंजर खेतों को उपजाऊं बनाकर,
हरे-भरे फसल लहराकर,
मोटे-मोटे अन्न उपजाने वाला,
मालिकों का पेट भरकर,
भुखे पेट सोने वाला
वहीं बदनसीब
भूखा पेट सुलाने,
परिवार को आतुर हूँ न !
हाँ, मैं मजदूर हूँ न !
वोटो के समय,
नोटों के गड्डियों से
तौला जाने वाला,
जीतने के बाद,
पर्वत सी,
झूठी वादे सुनकर
अपने रहमोकरम पर रहकर,
जीने वाला,
हादसे का
कब्रिस्तान हूँ न !
हाँ, मैं मजदूर हूँ न !
फैक्ट्री मालिकों के
फिर से गुलाम बनकर,
बात-बात में भठियों में
फेकने की गालियां
सहने वाला,
पगार काटने की धमकी,
सहते-सहते
पत्थर दिल बनने वाला,
वाला इंसान हूँ न !
हाँ, मैं मजदूर हूँ न !
तपती धूप में
पत्थर तोड़ने वाला,
सर्द दिनों में कम कपड़ों
में रात-दिन एक कर
कम्पनी का उत्पादन
बढ़ाने वाला,
मेहनतकस काम
के पक्के उसूल
हूँ न!
हाँ, मैं मजदूर हूँ न !
पापा पेट को भरने,
घर-गाँव-दुआर छोड़कर
शहर आने वाला
वक्त-बे-वक्त अपने
रहमोकरम पर रहकर,
झुठे ढाढस दिलाये जाने वाला
बदस्तूर हूँ न !
हाँ, मैं मजदूर हूँ न !
-जेपी हंस
05 April, 2020
हर उस जमात को मैं बुरा मानता हूँ ।
हर उस जमात को मैं बुरा मानता हूँ ।
जो कर न सके खुद की हिफाजत, अधुरा मानता हूँ ।
वक्त भी उसकी रहमत करेगी जो खुद डरे,
वरना कायामत को आये कोरोना को पूरा मानता हूँ ।
हर उस जमात को मैं बुरा मानता हूँ ।
जो कर न सके खुद की हिफाजत, अधुरा मानता हूँ ।
मैं ईश्वर को मानता हूँ, तुम अल्लाह को मानते हो
।
बढ़े वैसे कदम जहाँ, हर शख्स को जानता हूँ ।
फिर छलके न आँसू किसी आफत पर
वैसे आँसु को अधुरा मानता हूँ ।
हर उस जमात को मैं बुरा मानता हूँ ।
जो कर न सके खुद की हिफाजत, अधुरा मानता हूँ ।
मैं मंदिर में फँसा हूँ, वे मस्जिद में छिपे हैं
।
हजारों सालों से यही दकियानुसी दलदल में धसे हैं
।
चले करने जिस करामात को, हर करामात जानता हूँ ।
करे ऐसे करामात जो उसे बेहुदा मानता हूँ ।
हर उस जमात को मैं बुरा मानता हूँ ।
जो कर न सके खुद की हिफाजत, अधुरा मानता हूँ ।
कुछ धर्म का नशा पिलाते हैं, कुछ मर्म का नशा
पीते हैं ।
पिलाकर नशा वे बड़े खुशगहमी में जीते हैं ।
उसके हर एक खुशगहमी को मैं कुराफात मानता हूँ ।
ऐसे करने वाले हर शख्स को जानता हूँ ।
हर उस जमात को मैं बुरा मानता हूँ ।
जो कर न सके खुद की हिफाजत, अधुरा मानता हूँ ।
-जेपी
हंस