विश्व के
किसी भी धर्म या संप्रदाय में ग्रंथ एवं काव्यों की जयंती नहीं मनाई जाती, लेकिन
समस्त विश्व में हिंदू धर्म के श्रीमद्भगवद् गीता ही एक ऐसा ग्रंथ है जिसकी जयंती
मनाने की परंपरा पुरातन काल से चली आ रही है, इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि अन्य
सभी ग्रंथों को किसी मनुष्य द्वारा लिखा या संकलित किया गया है, जबकि गीता का जन्म
स्वयं श्री कृष्ण भगवान के श्रीमुख से हुआ है या स्वयं...
पद्यनाभस्य मुखपद्याद्विनीःसृता ।।
श्रीमद्भगवद् गीता का जन्म
कुरुक्षेत्र के मैदान में मार्गशीर्ष मास में शुक्लपक्ष की एकादशी को हुआ था, यह
तिथि वर्तमान में मोक्षदा एकादशी के नाम से विख्यात है । श्रीमद्भगवद् गीता एक
सार्वभौम ग्रंथ है । यह किसी काल, धर्म, संप्रदाय या जाति विशेष के लिए नहीं,
अपितु संपूर्ण मानव जाति के लिए है, इसे स्वयं श्री कृष्ण भगवान ने अर्जुन को
निमित्त बनाकर कहा है, इसलिए इस ग्रंथ में श्री भगवानुवाच का प्रयोग किया गया है ।
इस छोटे से ग्रंथ में इतने सत्य, ज्ञान और उपदेश भरे हैं जो मनुष्यमात्र को भी
देवताओं के स्थान पर बैठाने की शक्ति प्रदान करते हैं । भगवान श्री कृष्ण ने
कुरुक्षेत्र में पवित्र गीता का दिव्य उपदेश तो अर्जुन को दिया था, लेकिन वास्तव
में अर्जुन को माध्यम मात्र था । श्री कृष्ण उसके माध्यम से संपूर्ण मानव जाति को
सचेत करना चाहते थे । श्रीमद्भगवद् गीता सब तरह के संकटों से मानव जाति को उबारने
का सर्वोत्तम साधन है । गीता विश्व में भयमुक्त समाज की स्थापना का मंत्र देती है,
जो विश्व में शांति कायम करने में सर्वथा सक्षम है । ब्रह्मपुराण के अनुसार,
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का बहुत बड़ा महत्व है । द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण
ने इसी दिन अर्जुन को श्रीमद्भगवद् गीता का उपदेश
दिया था । यह एकादशी मोह का क्षय करने वाली है, इसीलिए इसका नाम मोक्षदा
रखा गया है । भगवान श्री कृष्ण मार्गशीर्ष में आने वाली इस मोक्षदा एकादशी के कारण
ही कहते हैं कि मैं महीनों में मार्गशीर्ष का महीना हूँ । इसके पीछे मूल भाव यह है
कि मोक्षदा एकादशी के दिन मानवता को नई दिशा देने वाली गीता का उपदेश हुआ था ।
महाकाव्य
महाभारत से उद्धत है गीताः महाभारत हिन्दुओं का एक प्रमुख
काव्य ग्रंथ है, जो स्मृति वर्ग में आता है, कभी-कभी केवल जय भारत कहा जाने वाला यह काव्यग्रंथ भारत का
अनुपम धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ है । विश्व का सबसे लंबा यह साहित्यिक
ग्रंथ और महाकाव्य, हिन्दू धर्म के मुख्यतम ग्रंथों में से एक है । इस ग्रंथ
हिन्दू धर्म में पंचम वेद माना जाता है । यद्यपि इस साहित्य की सबसे अनुपम कृतियों
में से एक माना जाता है, किन्तु आज भी यह ग्रंथ प्रत्येक भारतीय के लिए एक
अनुकरणीय स्त्रोत है । यह कृति प्राचीन भारत के इतिहास की एक गाथा है । इसी में
हिन्दू धर्म का पवित्रतम ग्रंथ श्रीमद्भगवद् गीता सन्निहित है । पूरे महाभारत में
लगभग 1,10,000 श्लोक हैं, जो यूनानी काव्यों इलियड और ओडिसी से परिमाण में दस गुणा
अधिक हैं ।
हिन्दू मान्यताओं, पौराणिक संदर्भों
एवं स्वयं महाभारत के अनुसार, इस काव्य का रचनाकार वेदव्यास जी को माना जाता है ।
इस काव्य के रचयिता वेदव्यास जी ने अपने इस अनुपम काव्य में वेदों, वेदांगो और
उपनिषदों के गुह्तम रहस्यों को निरूपण किया हैं । इसके अतिरिक्त इस काव्य में
न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्धनीति, योगशास्त्र, अर्थशास्त्र,
वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, खगोलविद्या तथा धर्मशास्त्र का भी
विस्तार से वर्णन किया गया है ।
विशालताः
महाभारत की विशालता और दार्शनिक गुणता न केवल भारतीय मूल्यों का
संकलन है, बल्कि हिन्दू धर्म और वैदिक परम्परा का भी सार है । महाभारत की विशालता
का अनुमान उसके प्रथमपर्व में उल्लेखित एक श्लोक से लगाया जा सकता है, जो यहाँ
(महाभारत में) है वह आपको संसार में कहीं न कहीं अवश्य मिल जायेगा, जो यहां नहीं
है वह संसार में आपको अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा । इसे महाभारत का अखिल भाग भी कहते
हैं । इसमें विशेषकर भगवान श्री कृष्ण की वर्णन है । वेदव्यास जी को पूरी महाभारत
रचने में 3 वर्ष लग गये थे । इसका कारण यह हो सकता है कि उस समय लेखन लिपि कला का
इतना विकास नहीं हुआ था । उस काल में ऋषियों द्वारा वैदिक ग्रंथों को पीढ़ी दर
पीढ़ी परम्परागत मौखिक रुप से याद करके सुरक्षित रखा जाता था ।
महाभारत
युद्ध की पृष्ठभूमि और इतिहासः महाभारत चंद्रवंशियों के दो
परिवारों कौरव और पाण्डव के बीच हुए युद्ध का वृत्तांत है । 100 कौरव भाइयों और
पांच पाण्डव भाइयों के बीच भूमि के लिए जो संघर्ष चला उससे अंततः महाभारत युद्ध का
सृजन हुआ, इस युद्ध की भारतीय और पश्चिमी विद्वानों द्वारा कई भिन्न-भिन्न
निर्धारित की गया तिथियां निम्नलिखित हैं- विश्व विख्यात भारतीय गणितज्ञ एवं
खगोलज्ञ वराहमिहिर के अनुसार महाभारत युद्ध 2449 ईसा पूर्व हुआ था । विश्व विख्यात
भारती गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध 18 फरवरी 3102 ईसा
पूर्व में हुआ था । चालुक्य राजवंश के सबसे महान सम्राट पुलकेशियन-2 के 5वीं
शताब्दी के ऐहोल अभिलेख में यह बताया गया है कि भारत युद्ध को हुए 3,735 वर्ष बीत
गए है, इस दृष्टिकोण से महाभारत का युद्ध 3100 ईसा पूर्व लड़ा गया होगा ।