21 December, 2014

हिन्दी के साथ अन्याय का पत्र देश के नीति-नियंता के नाम

 सेवा में,
1. महामहिम राष्ट्रपति, भारत सरकार, नई दिल्ली
2. माननीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली
3. राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, नई दिल्ली
4. मानव संसाधन एवं विकास मंत्री, भारत सरकार
5. क्षेत्रीय निर्देशक, कर्मचारी चयन आयोग, नई दिल्ली
महोदय,
निवेदनपूर्वक आपका ध्यान इस विषय की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ जिससे हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ अनुचित व्यवहार ही नहीं, वरन राष्ट्रीय अपमान भी हो रहा है । महोदय, कर्मचारी चयन आयोग, जिसका मुख्यालय सीजीओ कम्पलेक्स, लोदी रोड, नई दिल्ली में है । जिसकी देश भर में चार-पाँच क्षेत्रीय शाखाएं है । वह देश भर के लिए कर्मचारियों की भर्ती करती है । कर्मचारी चयन आयोग द्वारा प्रति वर्ष आशुलिपिक हिन्दी ग्रेड-डी और ग्रेड-सी की भर्ती की जाती है, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इस आशुलिपिक हिन्दी के पद की भर्ती के पाठ्यक्रम में हिन्दी से एक भी प्रश्न तक पूछा नहीं जाता है । इसके पाठ्यक्रम है- अंग्रेजी-100 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक । क्या यह हिन्दी भाषी छात्रों को इस पद पर बहाली से दूर रखने का कही षड्यंत्र तो नहीं ? या वे अन्य भाषा को बढ़ावा देना चाहते है? क्या वे हिन्दी दिवस पर केवल गोष्ठियाँ और सप्ताह मनाकर अपने कर्तव्य की ईतिश्री नहीं कर रहे हैं ? क्या यह हिन्दी का अपमान नहीं है कि हिन्दी आशुलिपिक की भर्ती किये जाए और उसमें एक भी प्रश्न हिन्दी से पूछे नहीं जाए ? क्या यह बेहतर नहीं होता कि हिन्दी और अंग्रेजी आशुलिपिक दोनों पद के लिए पाठ्यक्रम में हिन्दी-50 अंक, अंग्रेजी-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक होता । या हिन्दी आशुलिपिक के हिन्दी-100, अंग्रेजी आशुलिपिक के लिए अंग्रेजी-100 और दोनों के लिए सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक हो ।
साथ ही साथ इस तरफ भी ध्यान आकृष्ट करूँ कि कर्मचारी चयन आयोग देशभर में मैंट्रिक लेबल परीक्षा, इन्टर लेबल परीक्षा और स्नातक लेबल परीक्षा आयोजित करती है, लेकिन यहाँ हिन्दी भाषा के साथ इतना भेदभाव है कि इनमें से किसी भी लेबल के परीक्षा में एक भी अंक हिन्दी भाषा से जुड़े प्रश्न नहीं होते हैं । क्या यह राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ अन्याय नहीं है कि केन्द्रीय भर्ती बोर्ड द्वारा इस तरह के भेदभाव किए जाए और उसके नाक के तले बैठे हमारे नीति-नियंता चुपचाप देखते रहे ? क्या केवल हिन्दी दिवस पर देशभर में गोष्ठियाँ और हिन्दी-सप्ताह मनाने से राष्ट्रभाषा अपने मुकाम तक पहुँच सकती है, इस बात पर विचार किया जाए ।
कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली कुछ परीक्षाएं और उनके पाठ्यक्रम इस प्रकार हैः-
मैट्रिक स्तरीय प्रथम परीक्षा-गणित-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक
द्वितीय परीक्षा-अंग्रेजी-50 अंक
इन्टर स्तरीय
पद- क्लर्क, डाटा इन्ट्री ऑपरेटर प्रथम परीक्षा-गणित-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक, अंग्रेजी-50 अंक
द्वितीय परीक्षा-टाईपिंग टेस्ट
इन्टर स्तरीय
पद- आशुलिपिक हिन्दी व अंग्रेजी प्रथम परीक्षा- अंग्रेजी-100 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक
द्वितीय परीक्षा-शॉर्टहैंड का टेस्ट
स्नातक स्तरीय प्रथम परीक्षा-गणित-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक, अंग्रेजी-50 अंक
द्वितीय परीक्षा गणित-100, अंग्रेजी-100
तृतीय परीक्षा-टाईपिंग टेस्ट व इंटरभ्यू (पदानुसार)
अतः इस संबंध में भारतवर्ष के एक नागरिक होने के नाते मेरा कर्तव्य है कि भारतीय संविधान में उल्लेखित हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की अस्मिता और गरिमा को बरकरार रखने हेतु आपका ध्यान दिलाऊँ । कर्मचारी चयन आयोग द्वारा संचालित उपरोक्त परीक्षाओं के पाठ्यक्रमों में हिन्दी को शामिल करें, ताकि राष्ट्रभाषा हिन्दी का विकास हो, हिन्दी का उत्थान हो, हिन्दी भाषियों के साथ न्याय हो ।
                                                                                                  आपका भारतवासी,
                                                                                                  जयप्रकाश नारायण
                                                                                                ग्राम-दनियाला (पश्चिमी)
                                                                                                     डाकघर- शादीपुर
                                                                                                   जिला-अरवल (बिहार)
                                                                                          ईमेल- jpn.nsu@gmail.com
                                                                                 ब्लॉग- www.jphans.blogspot.com 




पप्पू का घड़ी


क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब सोता हूँ तो,
उठने का समय बताती है घड़ी ।
जब उठता हूँ तो,
स्कूल जाने के समय बताती है घड़ी ।
क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब खेलता हूँ तो,
घर वापस जाने की याद दिलाती है घड़ी ।
जब घर आता हूँ तो,
टीवी देखने की याद दिलाती है घड़ी ।
क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब टीवी देखता हूँ तो,
पढ़ने का समय बताती है घड़ी ।
जब पढ़ता हूँ तो,
दोस्तों से मिलने का समय बताती है घड़ी ।
क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब दोस्तों से मिलता हूँ तो,
माँ की याद दिलाती है घड़ी,
कि जल्दी घर आना ।
पर जब  घर पहुँचने में लेट होती है,
माँ डाँट सुनाती है , सोचता हूँ
काश ये घड़ी न होती ।
चैन से सोता ।
चैन से उठता ।
चैन से खेलता ।
चैन से टीवी देखता ।
चैन से पढ़ता ।
                  जे.पी. हंस






18 December, 2014

भोजपुरी का शेक्सपीयर-श्री भिखारी ठाकुर


बिहार के प्रसिद्ध गवइया श्री भिखारी ठाकुर का नाम शायद कौन नहीं जानता ? यह गवइया के साथ-साथ प्रसिद्ध नाटककार, गीतकार, कवि, भाषासेवी, लोक कलाकार, रंगकर्मी, लोक जागरण के संदेशवाहक, नारी विमर्श एवं दलित विमर्श के उद्घोषक, लोकगीत एवं भजन कीर्तन के अनन्य साधक थे । इनका जन्म 18 दिसम्बर, 1887 ई. को बिहार के सारण जिले के कुतुबपुर (दियारा) गॉव में एक नाई परिवार में हुआ था । उनके पिता जी का नाम दल सिंगार ठाकुर और माता जी का नाम शिवकली देवी था । वे एक गरीब परिवार से थे । बचपन में ही जीविकोपार्जन के लिए गॉव छोड़कर खड़गपुर चले गए । वहाँ उन्होंने काफी रूपया-पैसा कमाया, किन्तु वे अपने काम से संतुष्ट नहीं रहते थे । रामलीला में उनका मन लग गया था, इसके चलते ही वे अपने गॉव आकर एक नृत्य मण्डली बनाया और रामलीला खेलने लगे । इसके साथ ही वे गाना-गाते एवं सामाजिक कार्यों से जुड़े । उनकी पढ़ाई-लिखाई 30 वर्ष की उम्र में हुआ, इससे पहले वे अपने पुश्तैनी काम नाई का कार्य करते थे । इसके साथ ही उन्होंने नाटक, गीत और पुस्तकें लिखना भी आरम्भ किया । इनके पुस्तके की भाषा बहुत सरल होती थी, जिसके चलते ही बहुत लोग उनके तरफ आकृष्ट हुए । उनके द्वारा लिखे गए नाटक है- विदेशिया, भाई-विरोध, पुत्रवध, विधवा-विलाप, गवर-घिचोर, बेटि बेचवा, बिरहा-बहार, राधेश्याम-विहार, कलियुग-प्रेम । इसने भोजपुरी भाषा को जन-जन तक पहुँचाने में अहम योगदान दिया, जिसके कारण इन्हें भोजपुरी का शेक्सपीयर कहा जाता है । इनका निर्धन 10 जुलाई सन् 1971 को हुआ था । यह हिन्दी के लिए दुर्भाग्य की बात है कि इस महान लोक कलाकार को भोजपुरी का शेक्सपीयर तो कहती है पर इनको साहित्य में पहुच से दूर रखा गया है ।




17 December, 2014

इंसाफ-ए-पेशावर













वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
थी इतनी छोटी सी उम्र ।
 किया क्या था उसने जुर्म ।
अगर जुर्म उसने नहीं किया  ।
क्यों फिर ऐसा बदला लिया ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
पढ़ रहा था पाठ जीवन में,
इंसानियत और सच्चाईयों का ।
फिर क्या समझकर तुने,
तरफदारी किया बुराईयों का ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
कर दिया उनको किनारा,
सच्चाईयों की राह से ।
दरिंदों को मजबुती मिली है,
बुराईयों की स्याह से ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
अगर सियासत में खोट है,
तो क्या करेंगा ये चाँद तारा ।
सोचा था हमने एक दिन,
लाएंगे अमन और भाईचारा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
ये जमीं है तेरी,
ये वतन है तेरा ।
इस तन पे लिपटे,
कफन भी है तेरा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
एक दिन निकलना था,
घर-गली से बैंड-बाजा ।
उन्हीं गलियों से आज,
क्यों निकला है जनाजा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
मरने के बाद भी इंसानियत जज्बा हमारा,
बुराईयों का नाश ही है शपथ हमारा ।
हिम्मत और इंसानियत भरी हो,
अगर देना इस धरती पर जन्म दूबारा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
                         जे.पी.हंस



श्रद्धांजली (पेशावर स्कूली हमला में मारे गये बच्चों पर)










क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
माता-पिता ने उनको,
प्यार-दुलार से पाला-पोसा ।
कितनी भी की गलती उसने,
फिर भी ऐसा नहीं कोसा ।
इतनी कठोर न होता,
दिल-ए-पाषाण को  ।
क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
कोमल-सी थी बदन उनके ।
कमल-सी थी नयन उनके ।
वाणी थे जैसे मिठे रस ।
मिठे रस को न पिलाकर,
क्यों छोड़ दिया उस नौजवान को ।
क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
सीख रहे थे पाठ वे,
प्रेम, शांति और भाईचारे के ।
तोड़ना था तारे उनको,
पहुँचना था चाँद पे ।
ऐसे सपने को तोड़कर,
ला दिया क्यों शमशान पे ।
क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
                 जे.पी.हंस





16 December, 2014

मजदूर का बच्चा













पुस की  कुँहरे भरी सुबह ।
एक अनजान बालक से मिला ।
आते ही उसने,
सादर प्रणाम किया ।
था वह बेहद खुश ।
लेकिन मैं सकुचाया ।
फिर भी अपनी संस्कार समझकर ।
हमने अभिवादन स्वीकार किया ।
अनजान बालक को देखकर ।
मन में हिलोड़ पैदा होने लगा ।
हिलोड़ भी ऐसी, जो थी
काफी बेजोड़ ।
सोचा-खैर छोड़ो
अपना कार्य करना था
सो अपने कार्य में लगा
मैने सोचा-
आखिर होगा इसी गाँव का
जिस गाँव गया था मैं ।
था वह एक दलित बस्ती ।
केवल एक प्राथमिक विद्यालय,
पक्की सड़क के किनारे,
बाकी थी सपनों की कश्ती ।
फिर भी विचार और व्यवहार से,
उसके वार्तालाप में खो गया ।
बात ही बात में कुछ पूछा  ।
लेकिन न पूछ सका माँ-बाप का नाम ।
कौन है यह बालक ।
अद्भुत, अदंभ है जिसमें साहस ।
अंत में वह अपने घर लाया ।
पहले तो सकुचाया ।
फिर गया
तब पहचान में आया
वह था मेरे गाँव के मजदूरनी का बच्चा ।
टूटी-फूटी घर ।
बिखरे सामान
लेकिन थे बड़े सपने
नए तराने ।
शायद इस उम्र में ,
मैंने भी ऐसे सपने नहीं देखे ।
मजदूरनी हमारे गाँव में,
खेती-बाड़ी में कार्य करता था ।
था वह जाना पहचाना ।
उसने अपने बच्चे के बारे में
बताया था मुझे,
पर कभी देखा था नहीं, नहीं सोचा भी था
कि होगा ऐसा साहसी बच्चा ।
बिना कहे ही उसने, खुशी-खुशी
अपने सारे प्रमाण-पत्र लाकर दिखाया ।
मैंने भी हौसले, इरादे और धैर्य को बढ़ाया
समझाया, बताया ।
उसके माँ के दिल में था सपना ।
मेरा लाडला एक दिन
इस गरीबी से छूटकारा दे ।
मजदूरी करके भी
दो बेटे और एक
बेटियों को पढ़ाना ।
आज के महंगी की दौर में
कैसी टेढ़ी खीर है ?
फिर भी अजीब हिम्मत वाली थी वह
खुद फटेहाल रहकर भी,
लाडले को होनहार चाह रही थी ।
कैसी होती है माँ जो लाख
कष्ट सहकर भी
पुत्र के सपने साकार करती है
धन्य है वह माँ...धन्य है...
                         जे.पी.हंस



04 December, 2014

संस्कार

मेरे गाँव-मुहल्लों में जो दिवाना है ।
वहीं पर बुढ़े-बुजुर्गों का भी आशियाना है ।
मैंने गॉव-मुहल्लों के चीख से जाना ।
ये समाज कई वर्ष पुराना है ।
ऐसे संस्कारों से जिंदगी नहीं चलती ।
जिसका लक्ष्य बुजुर्गों को सताना है ।
दिल दुखाते है सब एक दूसरें को मगर
मुश्किल से हमें ही तो बचाना है ।
बुजुर्गों की आहट से डरती थी जिंदगी ।
आज उन्हें अपना घर विराना है ।
लड़ते है बाप-बेटे एक दूसरे से ।
ये हरकत बहुत बचकाना है ।
दुख-दर्द की आँधियाँ बहेगी ।
फिर भी हरपल हमें मुस्कुराना है ।
आँधी, बारिश या तुफान भी आये ।
हमें तो बस चलते ही जाना है ।
आज कु-संस्कारों से चलते पसरा है सन्नाटा ।
इस सन्नाटों से एक दास्तां बनाना है ।
चमगादड़ों की फौज से कहीं है बेहतर ।
आँधियों में एक दीप जलाना है ।
पढ़ों साहित्य, अपनाओं अपनी संस्कृति ।
फिर समाज में अच्छे संस्कार लाना है ।
मेरे गाँव-मुहल्लों में जो दिवाना है ।
वहीं पर बुढ़े-बुजुर्गों का भी आशियाना है ।
                             जे.पी. हंस





30 November, 2014

गीता जयंती 2 दिसम्बर पर विशेष

विश्व के किसी भी धर्म या संप्रदाय में ग्रंथ एवं काव्यों की जयंती नहीं मनाई जाती, लेकिन समस्त विश्व में हिंदू धर्म के श्रीमद्भगवद् गीता ही एक ऐसा ग्रंथ है जिसकी जयंती मनाने की परंपरा पुरातन काल से चली आ रही है, इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि अन्य सभी ग्रंथों को किसी मनुष्य द्वारा लिखा या संकलित किया गया है, जबकि गीता का जन्म स्वयं श्री कृष्ण भगवान के श्रीमुख से हुआ है या स्वयं...
                                    पद्यनाभस्य मुखपद्याद्विनीःसृता ।।
            श्रीमद्भगवद् गीता का जन्म कुरुक्षेत्र के मैदान में मार्गशीर्ष मास में शुक्लपक्ष की एकादशी को हुआ था, यह तिथि वर्तमान में मोक्षदा एकादशी के नाम से विख्यात है । श्रीमद्भगवद् गीता एक सार्वभौम ग्रंथ है । यह किसी काल, धर्म, संप्रदाय या जाति विशेष के लिए नहीं, अपितु संपूर्ण मानव जाति के लिए है, इसे स्वयं श्री कृष्ण भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर कहा है, इसलिए इस ग्रंथ में श्री भगवानुवाच का प्रयोग किया गया है । इस छोटे से ग्रंथ में इतने सत्य, ज्ञान और उपदेश भरे हैं जो मनुष्यमात्र को भी देवताओं के स्थान पर बैठाने की शक्ति प्रदान करते हैं । भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में पवित्र गीता का दिव्य उपदेश तो अर्जुन को दिया था, लेकिन वास्तव में अर्जुन को माध्यम मात्र था । श्री कृष्ण उसके माध्यम से संपूर्ण मानव जाति को सचेत करना चाहते थे । श्रीमद्भगवद् गीता सब तरह के संकटों से मानव जाति को उबारने का सर्वोत्तम साधन है । गीता विश्व में भयमुक्त समाज की स्थापना का मंत्र देती है, जो विश्व में शांति कायम करने में सर्वथा सक्षम है । ब्रह्मपुराण के अनुसार, मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का बहुत बड़ा महत्व है । द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने इसी दिन अर्जुन को श्रीमद्भगवद् गीता का उपदेश  दिया था । यह एकादशी मोह का क्षय करने वाली है, इसीलिए इसका नाम मोक्षदा रखा गया है । भगवान श्री कृष्ण मार्गशीर्ष में आने वाली इस मोक्षदा एकादशी के कारण ही कहते हैं कि मैं महीनों में मार्गशीर्ष का महीना हूँ । इसके पीछे मूल भाव यह है कि मोक्षदा एकादशी के दिन मानवता को नई दिशा देने वाली गीता का उपदेश हुआ था ।
महाकाव्य महाभारत से उद्धत है गीताः महाभारत हिन्दुओं का एक प्रमुख काव्य ग्रंथ है, जो स्मृति वर्ग में आता है, कभी-कभी केवल  जय भारत कहा जाने वाला यह काव्यग्रंथ भारत का अनुपम धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ है । विश्व का सबसे लंबा यह साहित्यिक ग्रंथ और महाकाव्य, हिन्दू धर्म के मुख्यतम ग्रंथों में से एक है । इस ग्रंथ हिन्दू धर्म में पंचम वेद माना जाता है । यद्यपि इस साहित्य की सबसे अनुपम कृतियों में से एक माना जाता है, किन्तु आज भी यह ग्रंथ प्रत्येक भारतीय के लिए एक अनुकरणीय स्त्रोत है । यह कृति प्राचीन भारत के इतिहास की एक गाथा है । इसी में हिन्दू धर्म का पवित्रतम ग्रंथ श्रीमद्भगवद् गीता सन्निहित है । पूरे महाभारत में लगभग 1,10,000 श्लोक हैं, जो यूनानी काव्यों इलियड और ओडिसी से परिमाण में दस गुणा अधिक हैं ।
            हिन्दू मान्यताओं, पौराणिक संदर्भों एवं स्वयं महाभारत के अनुसार, इस काव्य का रचनाकार वेदव्यास जी को माना जाता है । इस काव्य के रचयिता वेदव्यास जी ने अपने इस अनुपम काव्य में वेदों, वेदांगो और उपनिषदों के गुह्तम रहस्यों को निरूपण किया हैं । इसके अतिरिक्त इस काव्य में न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्धनीति, योगशास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, खगोलविद्या तथा धर्मशास्त्र का भी विस्तार से वर्णन किया गया है ।
विशालताः महाभारत की विशालता और दार्शनिक गुणता न केवल भारतीय मूल्यों का संकलन है, बल्कि हिन्दू धर्म और वैदिक परम्परा का भी सार है । महाभारत की विशालता का अनुमान उसके प्रथमपर्व में उल्लेखित एक श्लोक से लगाया जा सकता है, जो यहाँ (महाभारत में) है वह आपको संसार में कहीं न कहीं अवश्य मिल जायेगा, जो यहां नहीं है वह संसार में आपको अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा । इसे महाभारत का अखिल भाग भी कहते हैं । इसमें विशेषकर भगवान श्री कृष्ण की वर्णन है । वेदव्यास जी को पूरी महाभारत रचने में 3 वर्ष लग गये थे । इसका कारण यह हो सकता है कि उस समय लेखन लिपि कला का इतना विकास नहीं हुआ था । उस काल में ऋषियों द्वारा वैदिक ग्रंथों को पीढ़ी दर पीढ़ी परम्परागत मौखिक रुप से याद करके सुरक्षित रखा जाता था ।
महाभारत युद्ध की पृष्ठभूमि और इतिहासः महाभारत चंद्रवंशियों के दो परिवारों कौरव और पाण्डव के बीच हुए युद्ध का वृत्तांत है । 100 कौरव भाइयों और पांच पाण्डव भाइयों के बीच भूमि के लिए जो संघर्ष चला उससे अंततः महाभारत युद्ध का सृजन हुआ, इस युद्ध की भारतीय और पश्चिमी विद्वानों द्वारा कई भिन्न-भिन्न निर्धारित की गया तिथियां निम्नलिखित हैं- विश्व विख्यात भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ वराहमिहिर के अनुसार महाभारत युद्ध 2449 ईसा पूर्व हुआ था । विश्व विख्यात भारती गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध 18 फरवरी 3102 ईसा पूर्व में हुआ था । चालुक्य राजवंश के सबसे महान सम्राट पुलकेशियन-2 के 5वीं शताब्दी के ऐहोल अभिलेख में यह बताया गया है कि भारत युद्ध को हुए 3,735 वर्ष बीत गए है, इस दृष्टिकोण से महाभारत का युद्ध 3100 ईसा पूर्व लड़ा गया होगा ।





25 November, 2014

चुनावी ड्यूटी का खत


सुना है फिर एक खत आया है
चुनाव कराने के बावत,
मेरा भी बुलावा आया है ।
                   आज चुनाव कराना भी एक जंग है ।
                   नये-नये युवक-युवतियों में काफी उमंग है ।
                   पर जो-जो प्रत्याशी दबंग है ।
                   उन सबके कार्यकर्ताओं में छिड़ी एक जंग है ।
                   पता नहीं ये छिड़ा हुआ जंग,
                   क्या संदेश लाता है ।
                   सुना है फिर एक खत आया है ।
चुनाव पर जाने से पहले
बड़ी खामोशी छाँती है ।
शादी-शुदा लोगों को घर की
बहुत याद आती है,
पर जो कुवाँरे होते हैं उनकी
प्रेमिका आरती उतारती है ।
आरती उतारने का ये कैसी माया है ।
सुना है फिर एक खत आया है ।
                   बैलेट सिस्टम खत्म हुआ है ।
                   अब ईवीएम का जमाना है ।
                   बुथ लुटना, डराना, धमकाना ।
                   ये खबर बहुत पुराना है ।
                   पुराने खबरों से हूँ बेखबर,
                   क्योंकि नया सिस्टम आया है ।
                   सुना है फिर एक खत आया है ।
कर्मचारी होकर भी हम,
एक दिन के अधिकारी बनेंगे ।
बुढ़ा-बुढ़ी या नौजवान,
सभी मुझे पोलिंग अधिकारी कहेंगे
अधिकारी बनकर भी हमें,
हाथों में रंग लगाना है ।
सुना है फिर एक खत आया है ।
                   नोटा पर वोट पड़े या लोटा पर,
                   हमें अपना कर्तव्य निभाना है ।
                   हम सरकारी मुलाजिम है
                   ना हम कोई प्रत्याशी के दिवाना है ।
                   कोई हारे कोई जीते,
                   हमें केवल लोकतंत्र को जिताना है ।
                   सुना है फिर एक खत आया है ।
                   चुनाव कराने के बावत,
                   मेरा भी बुलावा आया है ।
                                                 जे.पी. हंस