22 October, 2015

हमारा सम्पर्क-सूत्र



  



सम्पर्क-सूत्र

नाम- जयप्रकाश नारायण उर्फ जेपी हंस

पता- ग्राम- भूपतिपुर

पोस्ट- ढेलमा

थाना- रामकृष्णा नगर

भाया- लोहिया नगर

पिन कोड- 800020

ईमेल आई.डी- jphans25@gmail.com

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ब्लॉग का नाम- जेपी-डायरी

 


07 October, 2015

संपूर्ण क्रांति के सूत्रधार- लोकनायक श्री जयप्रकाश नारायण

                

                                                                      
            “डरो मत अभी मैं जिंदा हूँ के चमत्कारिक नारों की उद्घोषणा करने वाले, भारतवर्ष में गाँधी जी के बाद सबसे लोकप्रिय राजनेता जिसने राज सत्ता से दूर रहकर लोक सत्ता, लोक नीति तथा लोक-चेतना का जीवन पर्यन्त पालन करने वाले, दलगत राजनीति को त्याग, सादगी, समता और सर्वोदय की त्रिवेणी में गोता लगाने वाले युग पुरुष श्री जयप्रकाश नारायण का जन्म उत्तर-प्रदेश और बिहार की सीमाओं का निर्धारण करने वाली पतित पावनी गंगा के कटाव पर स्थित सिताब दियारा गाँव में 11 अक्टूबर, 1902 को हुआ था । सिताब दियारा गाँव बिहार के सारण जिले में स्थित है । उन्होंने सनं 1919 में हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी से उतीर्ण किया । 1921 में इंटरमीडिएट की परीक्षा में न बैठकर उन्होंने छात्राओं और छात्रों को कॉलेज छोड़ने का आग्रह किया । बाद की पढ़ाई श्री जयप्रकाश नारायण ने विदेश जाकर पूरी की । वह 17 मई, 1922 से सितम्बर 1929 तक अमेरिका में रहे और कुछ न कुछ कार्य करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी की । उन्होंने ओहिया विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की ।
            विदेश से लौटकर श्री जयप्रकाश नारायण ने जैसे ही अपनी मातृभूमि पर कदम रखा तो उन्हें लगा जैसे दासता की लौह श्रृंखला में आबद्ध भारत माता उन्हें धिक्कार रही हो, सागर की विवश तरंगे जैसे उन्हें ललकार रही हों और ब्रिटानी सल्तनत का दमन-चक्र उनके सामने चुनौती दे रहा था । यह वह समय था, जब देश में स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था । उनका मानस पटल उद्वेलित हो उठा, भुजाएं फड़कने लगी और उनका यौवन हुंकार भरने लगा तब जवाहर लाल नेहरू के पारिवारिक सदस्य बनकर आनंद भवन, इलाहाबाद में रहने लगे । उन्होंने कांग्रेस को मजबूत बनाने के लिए संगठन पक्ष को अपनी शक्ति प्रदान की । यह काम अंग्रेजों की नजर में संगीन जुर्म था इसलिए उन्हें 1932 ई. में नजरबंद कर दिया गया । स्वाधीनता आंदोलन के तूफानी सफर में अनेकों बार वे कारागार के शिकंजों में जकड़ दिए गए, उन्हें घोर यातनाएं दी गयी. लेकिन उनका सफर नहीं रूका, बल्कि और भी तीव्रतर होता गया । कारागार की कालकोठरियों में उत्पन्न उनकी विप्लवी विचारधारा ने कांग्रेस की नीतियों को नकार दिया और उसी ने मई. 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी को जन्म दिया । 11 अप्रैल, 1946 को जब लाहौर जेल से उन्हें मुक्ति मिली तब वे युवकों और क्रांतिकारियों का हृदय सम्राट बन चुके थे ।
            15 अगस्त, 1947 को जब भारत विदेशी दासता की बेड़ियों से आजाद हुआ तब भारतवासी देश के नव-निर्माण के स्वप्निल सागर में गोते लगा रहे थे, तभी अचानक 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गाँधी की निर्मम हत्या हो गया तब वे विचलित हो उठे और गाँधीवाद के प्रवाह में बहते चले गए । युवावस्था में वे मार्क्सवाद और लेनिनवाद के घोर समर्थक थे ।
            जब भारत आजाद हुआ तब कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन श्री जयप्रकाश नारायण ने अपने को सता की राजनीति से दूर रखा । हालांकि उनको भारत का प्रधानमंत्री बनाने की आवाज भी उठ चुकी थी, लेकिन उन्होंने नकार दिया । वे राजनीति से अलग रहकर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति सतत संवेदनशील रहे । इन्हीं लोक सेवा के कारण उन्हें सनं 1965 में मैंग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया ।
            सन् 1974 आते-आते देश के तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के विरुद्ध असंतोष की लहर व्याप्त होने लगी । गुजरात में नौजवानों ने आंदोलन छेड़ दिया । बिहार में भी छात्रों का असंतोष विस्फोटक हो उठा और छात्रों एवं युवाओं ने आंदोलन का नेतृत्व संभालने हेतु श्री जयप्रकाश नारायण से अनुरोध किया । 9 अप्रैल, 1974 को पटना के गाँधी मैदान की एक सभा में छात्रों ने श्री जयप्रकाश नारायण को लोकनायक की उपाधि से विभूषित किया । उन्होंने जब आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार करने की घोषणा की तो संपूर्ण देश का राजनैतिक माहौल गरमा गया । 5 जून, सन् 1974 को पटना के गाँधी मैदान की विशाल ऐतिहासिक सभा में लोकनायक ने संपूर्ण क्रांति की घोषणा की । 25 जून की रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया तथा श्री जयप्रकाश नारायण सहित सभी विरोधी दलों के सभी प्रमुख नेताओं को जेल भेज दिया गया । जेल मे वे अस्वस्थ हो गए क्रमशः उनकी स्थिति नाजुक होती गई । दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और फिर बम्बई के जसलोक अस्पताल में डायलिसिस के सहार चिकित्सा चलती रही । जनवरी, 1977 मे देश में आम चुनाव की घोषणा हुई तो जयप्रकाश ने सभी विरोधी दलों को एक मंच पर इकटठा किया, जिसमें भिन्न सिद्धांतों के गठजोड़ से जनता पार्टी का जन्म हुआ और मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व में केन्द्र में जनता सरकार गठित हुई । उनका स्वास्थ्य ज्यादा साथ नहीं दे सका, अंततः 8 अक्टूबर, 1979 को उनका देहांत हो गया । आज बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में इनके अनुयायी ही सक्रिय है ।

25 September, 2015

दिल्ली में डेंगू

सुनो भाई चंगू मंगू,
देखो आया दिल्ली में डेंगू l
चारो तरफ कोहराम मचाया,
सोती सरकार को जगाया ।
जब से डेंगू आई है,
डॉ साहेब की निंद हेराई है ।
बीमारी सुनकर जनता दंग,
मच्छर साहेब बजाते मृंदग l
मुझ पर तो तुने काबू पाया,
लो मुझसे बड़ा मेरा चाचा आया।
छोड़ो दिल्ली भागो काठमांडू,
सुनो भाई चंगू मंगू,
देखो आया दिल्ली में डेंगू।
यहां नया संविधान है और  नई सरकार है।
बीमारी से लड़ने को मिला,
तेजधार वाली नई तलवार है ।
रामदेव बाबा ने उपाय सुझाया,
स्वदेशी घरेलू उपचार बताया ।
अंग्रेजी दवा लेता खुन चुस ,
उससे अच्छा बकरी दूध, पपिता का जुस।
तुम सब को पता है,
कौरव से अच्छा था पांडू।
सुनो भाई चंगू मंगू,
देखो आया दिल्ली में डेंगू ।

17 September, 2015

शायरनामा

दोस्तो नमस्कार,
                 कुछ खट्टे मिठ्ठे शायराना अंदाज में शेर प्रस्तुत है ।


बिन दिये पानी गुलाब में,
                  कली नहीं खिल सकती ।
असेम्बली में सीट भले ही मिल जाए ।
                  बस में सीट नहीं मिल सकती ।


ओ सुपुत्र के नाम पर कसम खाने वाले धरनेबाज ।
ईमानदारी के लिए इस तरह फाइट करते नहीं देखी ।
गुजरे जमाने की शायद याद नहीं,
आधी अंधेरी रात में ब्लैक को वाईट भी करते नहीं देखी ।


सुना है जमान की मिल्कियत में
तरबदर हुश्न भी बिक जाती है ।
थोड़ा सब्र रख जमाने की मलिका ।
तेरे स्वागत में जेठ की दोपहरी में भी घटा छा जाती है ।

13 September, 2015

हिन्दी की पोषण

किसी भी देश की राष्ट्रभाषा वहां की ज्ञान, चेतना और चिंतन की मूल धुरी होती है । ऐसे मे, हमारे ही घर-परिवारों में हिन्दी की उपेक्षा चिंतनीय है । अपनी राष्ट्रभाषा को मान देने की आकांक्षा कहीं गुम है । इसीलिए हर परिवार, हर नागरिक इसे अपना कर्तव्य समझे । जो राष्ट्रभाषा हिन्दी हमारी अस्मिता और सम्प्रभुता की प्रतीक है वह अपने आंगन में बेगानी-सी खड़ी है । ऐसे में जरूरी है कि भाषा को समृद्ध करने का प्रयाश हर भारतीय परिवार करे और समाज भी इसमे सकारात्मक सहयोग दे ।

राष्ट्रभाषा को मान और सम्मान दिलाने का काम केवल सरकारी प्रयासों और स्कूलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता । समाज और परिवार की भूमिका भी बड़ी अहम है । हिन्दी हमारी अपनी राजभाषा और मातृभाषा है । यदि हमारे परिवारों में कोई बच्चा अंग्रेजी शब्द का गलत उच्चारण भी करता है तो घर-परिवार के लोग उसे टोक देते हैं पर हिन्दी के मामले में इतनी सतर्कता देखने को नहीं मिलती । हमारा देश हिन्दी भाषी देश है । लेकिन हिन्दी के प्रति जो रवैया हमारे समाज और परिवार में देखने को मिलता है वह न केवल दुखद है बल्कि चिंतनीय भी है । मात्र स्कूली शिक्षा और सरकारी प्रयासों और सेमिनारों से हिन्दी को हमारे मन और जीवन में स्थान नहीं दिला सकता । हमारे घरों में बेगानेपन का दंश झेल रही हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहन देने की शुरुआत और सद्प्रयास हमें अपने घरों के भीतर ही करना होगा । आने वाली पीढियों के मन में अपनी भाषा के लिए सम्मान और प्रेम हो न कि स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा होने के नाते उसे जानने और पढ़ने की विवशता ।

हिन्दी का बेगानापन

हिन्दी को कामकाज की भाषा बनाने की कितनी ही दलीलें क्यों न दी जाएं पर अच्छी नौकरियों में प्राथमिकता अंग्रेजी बोलने और जानने वालों को दी जाती है । ये मुट्ठीभर अंग्रेजी पढ़ने और समझने वाले ही पद पाकर देश की दशा और दिशा तय करते हैं और हिन्दी के जानकार मन मसोस कर रह जाते हैं । आजादी के बाद का हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का सपना आज भी अधूरा है । सरकारी संस्थान हिन्दी को तिरस्कार ही देते आए है वहीं राजभाषा अधिनियम के चलते भले ही कुछ काम हिन्दी में करना पड़े, पर अधिकता अंग्रेजी को ही रहती है यानि देश के अंदर आज भी हिन्दी अपनी पहचान और हक तलाश रही है । इसकी वजह देश की भाषाई अनेकता जैसे कारण भी है यथा मिजोरम, नागालैंड. तमिलनाडु, आंध्र, कर्नाटक, असम, गोवा और उतर-पूर्वी राज्य खुद को हिन्दी से नहीं जोड़ पाए है । खेद की विषय है कि राष्ट्रभाषा के नाम पर आज भी देश एकमत नहीं है मगर समय की मांग है कि शासन के स्तर पर इस दिश में सहमति बनाते हुए सार्थक और दृढ़तापूर्वक किया जाए ।

हिन्दी का सफरनामा

हिन्दी की संस्कृत के अति क्लिष्ट स्वरूप और अरबी, फारसी जैसी  विदेशी और पाली, प्राकृत जैसी देसी भाषाओं के मिश्रण ने व्यापक आधार प्रदान किया है । जिस भाषा को इतनी सारी बोलियां और भाषाएं सीचें, उसके गठन की मजबूती का अंदाजा लगाया जा सकता है । देखा जाए तो पुरातन हिन्दी का अपभ्रंश के रूप में जन्म 400 ई. से 550 ईं. में हुआ जब वल्लभी के शासन धारसेन ने अपने अभिलेश में अपभ्रंश साहित्य का वर्णन किया । प्राप्त प्रमाणों में 933 ईं. की श्रावकवर नामक पुस्तक अपभ्रंश हिन्दी का पहला ग्रंथ है परन्तु अमीर खुसरो हिन्दी के वास्तविक जन्मदाता थे, जिन्होंने 1283  में खड़ी बोली हिन्दी को इसका नाम हिन्दवी दिया । बस, तब से ही यह हिन्दवी, हिन्दी बनती गई, बढ़ती चढ़ती गई है और पूरी दुनिया में निरंतर पल्लवित-पुष्पित हो रही है ।

17 August, 2015

ना तुने हाल जाने, ना मैंने हाल जाने ।



ना तुने  हाल जाने, ना मैंने हाल जाने ।
बन कर अनजान बेवफा, क्यों भूल गए दिवाने ।
जिंदगी में क्या बचा है, क्या रह गए तराने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
सुबह-सुबह उठने पर, सोचते है ऑफिस जाने ।
समय का बड़ा पाबंदी है, न चलेगा कोई बहाने ।
बॉस से डॉट पड़ेगी, क्यों देर कर दी आने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
शाम को छूटने पर, सोचते है जल्द घर जाने ।
यहाँ भी पाबंदी है, न चलेगा कोई बहाने ।
मैडम से डॉट पड़ेगी, क्यों देर कर दी आने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
रात को कहाँ खैर है जब सो गए सिढ़ाने ।
सुबह का क्या इंतजाम है, इसे अभी है बताने ।
जिंदगी बन गई है फुटबॉल, क्यों कोई हाल जाने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
ना तुने  हाल जाने, ना मैंने हाल जाने ।
बन कर अनजान बेवफा, क्यों भूल गए दिवाने ।
जिंदगी में क्या बचा है, क्या रह गए तराने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
                                    -   जेपी हंस
                         


06 August, 2015

कैसे आजाद है हम ?

कैसे कहूँ कि हिन्द के वासी है आजाद ।
यूँ कहूँ कि हम पहले से ज्यादा है बर्बाद ।
फर्क तो सिर्फ इतना है ।
अब मत पूछना  कितना है ।
पहले लूटते थे गोरे, आज काले लूट रहे हैं ।
महारानी राज करती थी पहले, आज नेता जी राज कर रहे हैं ।
आते हैं वे गरीबों के दर पर पंचवर्षिय योजना की भाँति ।
भेदभाव फैलाकर कहते, हम नहीं पूछते किसी का धर्म-जाति ।
गरीब जनता को चाहते है वे रखना, अनपढ़-गवार ।
ताकि यह सुनिश्चित हो, कभी न हो उनकी राजनीति हार ।
जीतने के बाद तो वे दिखते नहीं, गरीबों के किसी गाँव में ।
तड़पाते है किसी काम पर, छाले पर जाते  गरीबों के पाव में ।
विकास का कार्य सिर्फ दिखते  है प्रोग्रेस रिपोर्ट में ।
जनता का है कोई नहीं, भगवान ही है केवल सुपोर्ट में ।
गरीबों के विकास की छाया दिखती है  उसकी शक्ल में ।
आजादी के  नाम पर होती बर्बादी, न घुसी उनकी अक्ल में ।
जिस दिन अक्ल खुल जाएगी, उस दिन होगी सच्ची आजादी ।
 नेता जी डर जाऐगे सब, रूक जाएगी सबकी बर्बादी ।


31 July, 2015

डॉ कलाम को श्रद्धांजलि

देता हूँ श्रद्धांजलि करता हूँ कोटी-कोटी नमन ।
कैसे भूल पायेगा जो खिलाये आपने हिन्द में चमन ।
जगाया है जो आपने जन-जन में विश्वास ।
यही बात आपको बनाता है सबके खास ।
सर्व-धर्म-स्वभाव का जब आपने रखा ख्याल ।
बुद्धि, विवेक और कर्म से हिन्द को किया निहाल ।
नयन चक्षु प्लावित हुआ जब आपने जग छोड़ा ।
अन्तिम मिलन के खातिर सबने जाति-धर्म तोड़ा ।
जो दिया आपने नवयुवको को सफलता का मंत्र ।
बदल जाता है इससे जीवन का सारा तंत्र ।
मानते है सब आपको जीवन का प्रेरणास्त्रोत ।
कर्मों और विचारों से आपके होते है सब ओत पोत ।
व्यक्तित्व, कृतित्व और सादगी ये है आपकी पहचान ।
हिन्द नहीं भूल पायेगा जब तक रहेगा धरा-आसमान ।


22 May, 2015

काहे भूल गई माई हमके (भक्ति गीत)

काहे भूल गई माई हमके नयना चुराई के ।
प्रीत लगाई हमके आपन शरण में बुलाई के ।
तोहरी द्वारे माई भक्त जब निहारे ।
आस के चेहरा उम्मीद के सहारे ।
तन-मन में आस दिखाई, जिंदगी बनाई के ।
काहे भूल गई...........
मन में हई विद्या की लालसा, तन में उम्मीद की बयार ।
भाव है बेजोड़ हमरी, बाकी है तेरा प्यार ।
प्यार पूरी न हो पाई ,तोहरा के छोड़ के ।
काहे भूल गई..........
है यही इच्छा हमरी, नाम फैले सारा जग में ।
कोई कोना न हो बाकी, दिखे पग-पग में ।
पग-पग में नाम सुनाई, दिल के हिलोड़ के ।
काहे भूल गई..........

03 February, 2015

पार्टी फंड



जीतू इन दिनों काफी परेशान था, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें?  जीतू को काफी खुन-पसीना बहाने के बाद एक छोटी-सी नौकरी मिली थी । नौकरी मिलने से वह बहुत खुश था, लेकिन ऑफिस के कर्मचारियों के रवैये से इसे दिन-पर-दिन नफरत-सी होने लगी । जीतू जब-से ऑफिस ज्वाईन किया तब से पार्टी शब्द उसके जेहन को खोखला करता जा रहा था । जीतू गरीब परिवार से था, उसने कभी पार्टी के बारे में ज्यादा जाना-समझा नहीं था । बड़ी मुश्किल से मेहनत करके वह नौकरी प्राप्त किया था । वह समाजवादी विचारधारा से प्रेरित था, फिजूलखर्ची में विश्वास नहीं करता था, लेकिन ऑफिस में ज्वाईन करने के बाद से उनसे पार्टी मांगने की जैसे होड़ लग गई, कभी इस नाम पर तो कभी उस नाम पर । ऑफिस में स्टॉफ कम होने पर सभी कर्मचारी मिलकर आपस में कुछ पैसे मिलाकर हफ्ते दो हफ्ते में एक बार पार्टी का आयोजन कर ही लिया करते थे । यह सब चीजें जीतू को नापसंद था । उसने सोचा अभी अभी हम नये है, खुलकर बोलने से सभी नाराज हो जायेंगे, लेकिन नहीं बोलने से उसे जब-तब पार्टी के लिए पैसे देने ही पड़ते । जीतू ने मन ही मन एक उपाय सोचा, क्यों न सभी कर्मचारियों से यह कहा जाए कि एक पार्टी फंड बनाई जाए और उससे गरीब-असहाय लोगों की मदद की जाए  । अगले दिन जीतू ने सभी कर्मचारियों की एक मिटिंग बुलाई, कहाँ- हमलोग जो पार्टी कर मौज मस्ती करते है उस पैसे से एक पार्टी फंड बनाई जाए। मेरे मुहल्ले में कुछ गरीब और असहाय लोग रहते है, क्यों न हम सभी मिलकर कुछ पैसे हर महीने जमा करे और उस पैसों से गरीब और असहाय लोगों की मदद की जाए ? सभी इस सुझाव से सहमत हो गए और अगले रविवार को सभी कर्मचारी उस मुहल्ले में दाखिल हुए जहाँ गरीब-असहाय लोगों की बस्ती थी ।

फिजूलखर्ची

एक बार रवि ट्रेऩ से सफर कर रहा था । बगल की सीट पर दो लड़किया बैठी थी । देखने में काफी अच्छे घराने की लग रही थी । ट्रेन में लम्बी सफर में बातचीत के दौरान रवि को पता चला कि दोनों लड़कियाँ मेडिकल कॉलेज में पढ़ने के लिए किसी दूसरे शहर में जा रही है । एक ने अनिता तो दूसरे ने सुनिता नाम बतायी । दोनों लड़किया सफर के दौरान गप्पे मारती हुई तरह-तरह के फूड खा रही थी । जैसे ही ट्रेन अगले स्टेशन पर रुकी । सुनिता और अनिता प्लेटफार्म से उतरी । इन दोनों को उतरते ही दो-तीन अनजान लड़का-लड़कियों की भीड़ उसके पास मँडराने लगी । देखने में कम उम्र के ये बच्चे बेहद गरीब परिवार के लग रहे थे । फटे पुराने कपड़े पहने ये दोनों लड़कियों से अपनी मुँह की तरफ इशारा करके कुछ खाने के लिए पैसे की मांग कर रही थी । सुनिता और अनिता द्वारा बार-बार मना करने के बावजूद वे कभी पैर पकड़ लेती तो कभी हाथ । किसी तरह ये दोनों लड़कियाँ स्टॉल से खाने की सामान लेकर खाने में मशगुल थी । तभी ट्रेन की सीटी बजी, आधा खाना खायी और आधा प्लेटफार्म पर फेककर ट्रेन पर चढ़ गई । प्लेटफार्म पर खड़ी लड़के-लड़कियाँ जो सुनिता और अनिता से पैसे मांग रही थी, वह प्लेटफार्म पर फेके गए खाने के सामान को उठाकर खाने लगी और सुनिता और अनिता की तरफ कातर नेत्रों से निहार रही थी, तभी ट्रेन खुल गई ।

सोच-विचार

कपकपाती ठंड में रतन ताजा हवा खाने के लिए जैसे ही खिड़की खोला, उसकी नजर एक आठ वर्षीय उस लड़की पर पड़ी, जो कचड़े की ढेर से कुछ चुन रही थी । बदन पर फटे-चीटे कपड़े, बिना चप्पल के पॉव, बिना चादर ओढ़े ही सुबह के पाँच बजे इस घने-कुहरे भरी सुबह में । रतन इस लड़की को लगातार एक हफ्ते से देख रहा था । वह बिना लेट-लतीफ के इस काम में प्रतिदिन लग जाया करती थी । वह अपने श्रीमती जी को कोसती, वाह ! मोटे गद्दे वाले लिहाफ में लिपटे, जिसके पास दर्जन भर के ठंड के वस्त्र, शॉल, आधे दर्जन चप्पल होने के बावजूद भी आठ बजे से पहले बिस्तर कभी नहीं छोड़ती । अगर मेरे श्रीमती जो को इतनी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होती तो पता चलता, किस तरह उठी जाती है सबेरे-सबेरे ।  तब पंत जी की ये पंक्तियाँ याद आती है ।
‘’हम क्या थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी ।

आओ विचारें आज मिलकर समस्याएं सभी’’ । 

31 January, 2015

मन चंगा तो कठौती में गंगा

03 फरवरी को संत रविदास की जयंती है । संत रविदास को रैदास के नाम से भी जाना जाता है । 14वीं शताब्दी में जन्में इस संत ने अपने समय में समाज में फैली जाति-पांति, धर्म, छुआछूत, पाखंड, अंधविश्वास आदि बुराईयों को दूर करने के लिए अनेक भक्तिमयी रचनाएं लिखीं । अपने उपदेशों द्वारा लोगों को पाखंड एवं अंधविश्वास को छोड़ कर सच्चाई के पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया । उन्होंने ही मन चंगा तो कठौती में गंगा का संदेश देकर लोगों को सर्वप्रथम कर्म की प्रधानता बतलाया ।
इनके जयंती के अवसर पर शब्द क्रांति के द्वारा प्रस्तुत है एक कविता ।

मन चंगा तो कठौती में गंगा ।
कह गए संत रविदास ।
ये वचन क्यों तु भूल गया ।
डूब के बन गया भोग विलास।
पाखंड, अंधविश्वास और बुराइयाँ छो़ड़ ।
सच्चाई के पथ पर चलना ।
कर्म पूरी लगन से कर ।
परिश्रम से कभी भी न डरना ।
ये जाति-पांति, धर्म, छुआछुत ।
किसी मन में विपदा न खाए ।
खोरहर करें इस तन-मन को
सो मिट्टी में जल्दी मिल जाए ।
राम, रहीम और गुरुनानक ।
सब एक ही का है नाम ।
ईश्वर भक्ति के पचड़े में न पड़कर ।
मिलजुलकर करै सब अपना काम ।
वेद, कुरान, बाईबिल, गुरुगंथ में ।
एक ही ईश्वर का है गुणगान ।
धर्म-कर्म के लफड़े में न पड़कर ।
इनके विचारों से करै स्नान ।
मन चंगा तो कठौती में गंगा ।
कह गए संत रविदास ।

हँसी के गोलगप्पे

(1)
दो औरतें को 20 साल की सजा हुई । 20 साल बाद दोनों जेल से बाहर निकली और एक दूसरे से मुस्कुरा कर बोली, चल, बाकी बातें घर जा कर पूरी करते हैं ।
(2)
एक छात्र ने गणित के अध्यापक से कहा-सर....   अंग्रेजी के अध्यापक तो अंग्रेजी में बातें करते है, हिन्दी के अध्यापक हिन्दी में बातें करते हैं । आप भी गणित में बात क्यों नहीं करते ।
अध्यापक-ज्यादा तीन-पाँच न कर फौरन नौ-दो ग्यारह हो जा, नहीं तो चार-पाँच रख दूँगा तो छठी का दूध याद आ जाएगा ।
(3)
संता ने अपनी बेटी के रूम में सिगरेट देखा ।
संता-हे भगवान, ये सिगरेट पीने लगी ।
फिर शराब की बोतल देखी,
संता- हे भगवान, शराब भी पीने लगी ।
कुछ देर बाद लड़की के रूम में एक लड़के को देखा ।
संता- हे भगवान, मेरी सब शक दूर हो गई, सब कुछ इस लड़के का है ।

15 January, 2015

वक्त की हालात

सुनाता हूँ हे मातृभूमि एक दर्द भरी कहानी ।
गम-ए-जदा हम ही नही, हर जन की यही जुबानी ।
कहने को तो कहते सब, एक ईश्वर की है संतान ।
फिर दाता क्यों बनाया, उच्च-नीच का विधान ।
राज करता अदल-बदलकर वहीं केवल ठग से ।
क्या दाता तेरा छूट गया, लगाम अब इस जग से ।
मार-काट व खुन-खराबा, यही है इनकी मर्दानी ।
जात-पात व धर्म-कर्म पर बाँटना, बची यही निशानी ।
आपसी झगड़े जब तक रहेगा या रहेगा बड़ा फर्क ।
इस जिंदगी से बेहतर होता, अगर मिल जाता नर्क ।
इस भूमि की यही कहानी, नरक से भी बदतर है ।
सुनने में आया ये हालात तो अभी कमत्तर है ।
ऐसी रही हालात तो क्या होगा आने वाले दिनो में ।
बम-तोप से मर मिटेंगे, जलेंगे उन्हीं मशीनों में

01 January, 2015

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है शीत से
आकाश में कोहरा गहरा है
बाग बाजारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं, उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतजार करों
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नकल में सारी अक्ल बही
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धर
जब स्नेह-सुधा बरसायेगी
शस्य-श्यामला धरती माता
घर-घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र-शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय-गान सुनाया जायेगा
                                  -अज्ञात